आनाथ स्पर्श

तस्वीरों की सच खोजती दीवारें
बनावाटी सच पर मिट्टी की खुशबू
आसमान से बरसते अन्नाजों  पर
राजनीति के दाल का काला और महंगा हो जाना

बढते भूखे-नंगो की गंगा-जमुनी प्रवाह में
जीवन को तलाशती आंखें

पिघलती सांसो मे शीशें का घुलना
बिलखते सपनों में गहराते अंधेरें
माँ की लाठी से गुम होती आवाज

बढते लोगों की तदाद में
अकेलेपन की बाढ से झुलसती अपनापन

और आनाथ स्पर्श से डर का खत्म हो जाना !!

9 comments:

  1. अच्छे भाव, सुंदर रचना


    पिघलती सांसो मे शीशें का घुलना
    बिलखते सपनों में गहराते अंधेरें
    माँ की लाठी से गुम होती आवाज

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  2. मर्मस्पर्शी कविता।

    सादर

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  3. bahut hi acchi post dil ko chhune wali

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  4. अच्छी अभिव्यक्ति के लिए बधाई |

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  5. मार्मिक और हृदयस्पर्शी ...

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  6. वाह... वाह .... क्या बात है .... बहोत खूब | धन्यवाद |

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