भटकन है जहाँ

रास्तें दो थे
कौन था वह जिसनें
हमारी पहली सांस को रास्ता दिया
जिसपर चलते हुये सांसो ने  
कदम बढाना
और बढना सीखा

पर रास्तों के दोहराव ने
युग-युगांतर की
भटकन को साश्वत करार दिया
उन रास्तों पर दुबारा लौटना संभव ना था
भटकना तय था

उन पगडंडियों को किसने मिटाया
जहाँ सौंधी मिट्टी की खुशबू है !!

साथ जो मिलता उन्हें

चलते रहे बहुत मगर
मंजिल का साथ ना मिला

सुखनसाज़  बहुत बजते रहे
पर करारे-सुकून ना मिला

तख्तों ताज़ पर बैठे रहे वो
पर वादों पर फूलों सा चमन ना मिला

मिलती जो उन्हे इक खुशी चाँद सा
चाँदनी जो छुपती,पर बादलो का साथ ना मिला

पहाड हर तरफ रहे पिघल भी जाते
मगर उगते सूरज का इन्हें साथ ना मिला

जलती रही चिरागें-मोहब्बत बहुत
गुजरते वक्त में उम्र का साथ ना मिला

क्या खो के वे ताकीद कर रहे है
सूना है कि उन्हें अपनों का साथ ना मिला

भींग भी जाते और बरस जाते वो मगर
बादलों को आसमान का साथ ना मिला !!

मुमकीन हो सफ़र

बहुत सुंदर है किताब फूलो की
बदल दी है हिसाब वसूलो की

मुमकिन हो हर सवाल मासूमों की
बात गुलाब की हो ना कि कांटो की

रौशन हो शहर आओ बात करे फरीस्तो की
आ जाओ कि आसान हो दौर मुश्किलों की

छु लो कि मुकम्मल हो आसान हो सफर रातों का 
गुफ्तगू में रही वो कह दो कोई नज्म होंठों की

अनकही अनछुई और अनदेखी रही सब की
अब न रहो चुप कि कह दो हर बात रकीबों की   !!

ना 'मैं' में कोई आग था

गमों से गमों की बात हुई
ना तुमने कहा ना मैंने सुना 

रुत बदल बदल गई
ना मुझे दिखा ना तुझे दिखा

बहार गुनगुनाने लगी
ना तुम हंसे ना मै हंसी

चमन में फूल खुब खिलें
ना तुनें छुआ ना मैंने छुआ

रात खुब रौशन रही
ना मै जली ना तुम जले

खुब डुबा भी आसमान
ना मै भींगी ना तुम भींगें

नींद ख्वाब ख्वाब चली
ना तुम सोये ना मै सोयी

उम्र की सांझ भी ढल गई
ना मैंने जिया ना तुमने जिया

ना 'मै' में कोई आग था
ना 'तुम' में कोई शबाब था

हुआ जो था गज़ब हुआ
धरा-गगन के बीच हुआ !!

डुबती गई इंच इंच

इंच इंच करके
मुस्कान खोता गया
समंदर में
सूरज रोज कुछ
और ज्यादा भारी होता गया
सुबह के कंधो पर

साहिल काटता रहा उठती लहरों को
इसतरह समंदर गुमसुम रहा
कई कई दिनो तक
उसने समेट रखी थी आंखो की नमी
आंचल में
रात जब भी अकेली हुई
ओढती रही और भींगती रही

कुछ इसतरह
पिघलती रही हिमखंड की
वह बदली कि
आसमान धडकनो में सिमटा रहा
टूटते तारो के संग बिखरता रहा

समंदर स्याही की रहा
लिखने के पहले वह डुबती गई
लकीरो में इंच इंच !

तब होगी मुकम्मल

आह की तीर से
धायल पृथ्वी के लब पर
जब एक मुस्कान रिसेगी
तब एक कविता मुकम्मल बनेगी

दर्द के नीर में
आस की प्यास से 
जब एक नाव चलेगी
तब एक कविता मुकम्मल बनेगी

बंद दिलो के दरवाजो पर
राग और विराग से कोई दस्तक
नई धुन छेडेगी
तब एक कविता मुकम्मल बनेगी

नष्ट होते जंगलो में
ठूंठ दरख्तों पर
चिडियों के चहकने से
जब कोई सूरज निकलेगा
तब एक कविता मुकम्मल बनेगी

सूनी आंखो की
सूख गई पुतलियों में
जब अश्क उम्मीद बनकर तैरेंगें
तब एक कविता मुकम्मल बनेगी !!

वह नदी रही पर सूखी रही

यादो के निर्मल झरनें में बहती रही
जाने किस किस लम्हो में
वह नदी रही पर सूखी रही

बहती रही उफनती रही
कलकल  हुई छल छल बनी
वह नदी रही पर सूखी रही

सुनहरी हुई सौंधी बही
सूरज डुबा मद्धम शाम हुई
वह नदी रही पर सूखी रही

गुजरती रही हरीभरी हुई
शांत लहरे तन्हा रातें रेंत हुई
वह नदी रही पर सूखी रही

गाती चली सुमधुर बही शीतल हुई
लहर लहर मचल मचल
वह नदी रही पर सूखी रही !!

आशा टिमटिमाती रही

कई आंखे निकल आयी थी 
तस्वीरों में
पर कमरा भरा था अंधेरो से
जुगनूये माँ बन गयी थी आंखो की
घुप अंधेरा गहरा रहा 
पर आशा टिमटिमाती रही 
बंद कमरो में और
आत्मा अंधेरो मे
प्रदिप्त थी
ऊँमकार स्वरूप !!

बदलते तहजीब में नई अंदाज है वो

हिमालय से हो या
शिव जी की जट्टा से
गंगा की तरह
एक पवित्र भेंट है
कविता

ख्वाहिशों के बीच
एहसास की भटकन में
कोई नई धून है 
कविता

कांटो के बीच खिले हुये
फूल से
महकती कोई चमन  है
कविता 

कीचड के कोख में
सुबह-सवेरे  खिलता
एक कमल है
कविता

जानवरो के बीच
कस्तुरी के लिये भटकता
कोई नन्हा मृग है
कविता

बदलते तहजीब की
नई अंदाज़ है 
कविता !!

भूख हो कविता

लिख दो वह सब
जहाँ भूख ना जलती हो
मन की आग पर

भूख हो
एक कविता
जिसे सुबह शाम पढी जाये

जिसे कमाने निकले
सुबह को
लौटना हो जिसपर
सांझ को

सकून से सोये
रात को
गर्वांवित होये कविता !!

अय हवा बारिश कर दे पत्तियों की

सरकार की आडी तिरछी नजरें
जला रही हैं बस्तियाँ
खेतों की मेहनत खाक होती रही है
गोदामों में
इस पर जश्न रही है गिध्दों की  
पगडंडियाँ शहर बनती जा रही है

हर तरफ फैला हुआ है दूर दूर तक
जंगलो के ठीक बीचो-बीच
सूखी और दरकी दुनिया बनी हुई है
बेबस और लाचार मौन की
विवशता पर स्याह रातें फैली हुई है 
 
गुजरती शाम घने अंधेरे जंगलो से 
सूरज भी कही दूर डूबता रहा है
पत्थरों के साये में मासूम हिरणें
रस्सियों के बीच सांसे ले रही हैं 

अय हवा बारिश कर दे पत्तियों की
जंगलो के बीच तपिश पसरी पडी  है
और दरकी हुई दुनिया को थोडी कम कर दे !!