लहू के रंग

झाडू हाथ में थमा
उसे दश्त के हवाले कर दी

चिराग हांथो से छिनकर
सूरज को
रात के हवाले कर दी

उसकी बस्ती में
कोई आता जाता नहीं
उसकी कश्ती को मौजों के
हवाले कर दी

आसमान
सिकुड़ गया कबका
चाँद को
अंधेरो के हवाले कर दी

मौसमों को
क्या पता था कि
बादल सूख जायेंगें 
जमीन को
बंजर के हवाले कर दी

गुजरते वक्त में
उसने
खूब निभाया साथ अपनो का
लहू के रंग ने उसे
गैरो के हवाले कर दी !

6 comments:

  1. .बहुत भावनात्मक प्रस्तुति .आभार अमिताभ बच्चन :सामाजिक और फ़िल्मी शानदार शख्सियत .महिला ब्लोगर्स के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

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  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-03-2013) के चर्चा मंच 1193 पर भी होगी. सूचनार्थ

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  3. बहुत प्रभावी ... हर मंज़र अलग अंदाज़ लिए ...
    लाजवाब ...

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  4. बहुत सुन्दर ...
    पधारें " चाँद से करती हूँ बातें "

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