गर अंधेरे मे कोई नाच ना होती

दांत तले जुबान ना दबती 
असल मे एहसास खुबसूरत होते तो
वे कभी ना मुरझाते, साहब
ना यहां कोई जमीर बिकता
और ना ही अन्धेरे मे कोई नाच होती

हकिकत तो यह है कि
यहां रोज पिटारे से
रंग-बिरंगे फ़नोवाले
सांप निकलते है

इनकी जुगलबंदी से
धरती छलनी होती है
और आसमान तोले जाते है
हवा मे
विष की उमस इतनी की
बादल सूख जाते है और
जमीन बंजर होती चली जाती है

छांव कोई कल्पना है
अब जो सपनें मे भी नही मिलती है !

2 comments:

  1. एहसास जैसे भी हों फूलों की तरह कभी न कभी मुरझा जाते हैं ... जब तक प्रेम की खाद न मिलती रहे ...

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