सपनों के आकार प्रकार में

अंधेरें के उठा-पटक से
दीपक बुझ सा जाता है

उम्र में कैद
स्याही 
खत्म होने का नाम तक नही लेती
लिखती जाती है जिन्दगी
कमोवेश
आलाप प्रलाप

एक जुगनू रात भर जागता है
टिमटिमाता है
सपनों के आकार प्रकार में

कई वजहें
एक लकीर खिंचती हैं
सच के
इसपार और उसपार
कैद होता है आदमी
बिताये रिश्तों के उम्र में

ठूंठ शाख पर
चांद भी ठिठक जाता है
परिंदों ने शायद
कही और घर बना ली हैं !

बहरुपिये जिस्म से बचना

होश
चांद पर तैरता पानी
बूंद बूंद गिरता 
कि वक्त बहुत कम हैं

बिदा होने का
वक्त आये
कुछ ऐसे कि
जहां कोई जिस्म नही हो

भौतिकता की जहर
पीते हुये वक्त बेवक्त
उम्मीद से खाली करता 
बेदखल प्रेम से

सिर्फ़ खिलौनें हो
उल्कें नही
जो टूट के विखर जाये 
आंचल तारों से भरे फ़िर 
मां एक बार फ़िर कहें कि
फ़िक्र ना कर
वक्त पर सोया कर और 
पढने के लिये
सुबह का वक्त ही सही है

आंखों में
एक छोटा सा सपना हो
सच्चा
पुरा हो और
किताब हो जाये
बहुरुपिये जिस्म से बचना
धरती को गर्मी से बचाना है


जहां कोई अपना न था

गांव अपना खोजता रहा
वर्षों
पर लकीरें मिटती रही
वहीं
जहां कोई अपना था

उम्मीद कोई जंगल है
एक के बाद एक
खत्म होती जाती है

रेत की तरह खुरदरी और
ना टिकती कही
ना कोई सीलन
ना ही नमीं
आंधियों में उडा करती हैं 

बस यूं ही
कभी गौरैयों तो
कभी अन्य परिन्दों को
देखकर
जी लेती है जिन्दगी !

भूख ने रुप बदल लिया


एक जहान 
जो ॑मैं ॑सा रहा 
कुछ लोग आये थे
जिस्म के कई हिस्सो को
टुकडे-टुकडे में काट गये

घाव जो 
अभी भरे भी नही थे
कि छिल गये
और रूह 
कई हिस्सों में बिखर गई

शाम धुंधली रही
रात अन्धेरी
बर्तन बिल्कुल खाली
भूख ने रुप बदल लिया 
समन्दर बिल्कुल शांत पडा था , कि 
चांद को वे समझाने में लगे 
कि रोटी गोल है

इस तरह कुछ 
सुबहें , भी थकी मिली 
कही हाथ, तो कही पैर
जाने कितनों के घरों में
बिखरा पडा था 'मैं॑॑॑ '!!!