लकीरों मे कैद गौरैया

दहलीज से बाहर उसने 
कभी अपना पांव रखा था 
यही वजह थी कि खिडकी और रौशनदान वाली कवितायें 
उसके रुह को छू लेती थी, 

लकीरों मे कैद गौरैया 
खुले आसमान का सपना 
कभी देख नही पाती थी 
उसे तो रौशनदान से 
सुबह का सूरज देखने भर की आदत थी, 

कविता के लिये 
ज्यादा शब्दों की जरुरत नही होती  
और कहानियों मे 
वह उलझना नही चाहती  
क्योंकि उसे अंधेरें का रहस्य पता है !

तब माँ बहुत याद आती है

चाँदनी के वीराने में
दर्द के सिरहाने पर
जब कोई तितली उडती है
और कंधो के आस पास मंडराती है
तब माँ बहुत याद आती है

उडती है खुश खुश
बेहिसाब गमों के बीच
एक तितली
फड़फड़ाती पंखो से जब कही कुछ बोल जाती है 
तब माँ बहुत याद आती है

वह बैठती है
पलकों पर सुबह सबेरे 
अश्को की नमी मे
मायूसी के मौसम में 
जब पंखो से रंग उसके झर जाते है
तब माँ बहुत याद आती है

पूजा की थाली में
माली के फूलों की खुशबू पर
जब कोई तितली मंडराती है 
तब माँ बहुत याद आती है
 
फूल की कशिश और  
खुशबूओं की चाहत में       
बेटियों के स्पर्श से जब
कोई तितली रंग बिरंगी हो जाती है 
तब माँ बहुत याद आती है
 
सपनों के रंगो से
दिन-रात की चादर पर
जब कोई तितली नया रंग भर जाती  है
तब माँ बहुत याद आती है

प्यार की धून पर
तितली के थिरकन से
मन फूल सा खिल जाता है
और तब वह
दूर दूर तक जाकर लौट आती है
तब माँ बहुत याद आती है !!
 

सुनहरे ख्वाब से दिन

सुबह सुबह कांच का गिलास टूटा
पर उसने अपने नर्म ऊंगलियों से उठाई
टूटे कांच के टुकडो को

सुबह ही था
जब उसने मां से बात किया
बताया कि जीने के लिये
पैसो से ज्यादा
भरोसे की जरुरत होती है ना मां
यह तुमसे ज्यादा और कौन जानता है
मैने मां से कहा

चेहरे के ऊपर कई चेहरे हो सकते है
पर प्रेम को
किसी चेहरे की जरुरत नही होती है
मां ने कहां
तुमसे ज्यादा और कौन जान सकता है भला
तू छोटी है पर
देख तू तो
टूटे बिखरे कांच को ऊंगलियो से उठना भी जानती है

तुझे याद है ना मां
पापा सिर्फ़ शाम को आते थे
और सुबह
हमारी मुठ्ठी मे होती थी
पूरा दिन टिक टिक पहियो पर ऐसा चलता
जैसे सुनहरी धूप की आगमन की तैयारी मे हम सब लगे हो
ना कोई भूत था और कोई भविष्य होता हमारे आगे पीछे
सिर्फ़ शाम का इंतजार होता था

वर्षो बाद मां ने यह बताई की
उम्र से ज्यादा
अनुभव देते है जीवन को विस्तार
पर हमने जो जिया है
वह किसी भरोसे का मोहताज पल नही रहे है

प्रेम से अंकुरित पल रहे थे वे दिन
जब पापा के जीवन मे
सहज हम सब उतरते थे
और वे मुस्कुरा कर
मां को यूं छेड देते थे ! 

नमक समंदर था

जीवन नदियों से चला
और समन्दर पर ठहर गया
बस और क्या था
नमक ही नमक

रुकना जरुरी था
कुछ समय के लिये
झील-झरनो के पास
ताकि मिठास नदी की बनी रहे
पर रफ़्तार ऐसी रही कि 
हवा की नमी तो गई
साथ ही
आंखो का पानी भी सूख गया

अनकहे की आवाज थी
अनसूने की कल्पना
और अनदेखे सपनो की पहचान पुरानी थी
पल पल बीतते वक्त मे
उसने बचा रखा था सब्र
पर तलाश खुद से खुद की रही

याददाश्त का जाना सदियो पुराना था
खुद के अन्दर
खुद को पाना मुश्किल ना था
कुछ यूं था कि
चिठ्ठी तो मिली गई 
पर मंजिल का पता ना था !