जीवन नदियों से चला
और समन्दर पर ठहर गया
बस और क्या था
नमक ही नमक
रुकना जरुरी था
कुछ समय के लिये
झील-झरनो के पास
ताकि मिठास नदी की बनी रहे
पर रफ़्तार ऐसी रही कि
हवा की नमी तो गई
साथ ही
आंखो का पानी भी सूख गया
अनकहे की आवाज थी
अनसूने की कल्पना
और अनदेखे सपनो की पहचान पुरानी थी
पल पल बीतते वक्त मे
उसने बचा रखा था सब्र
पर तलाश खुद से खुद की रही
याददाश्त का जाना सदियो पुराना था
खुद के अन्दर
खुद को पाना मुश्किल ना था
कुछ यूं था कि
चिठ्ठी तो मिली गई
पर मंजिल का पता ना था !