नमक समंदर था

जीवन नदियों से चला
और समन्दर पर ठहर गया
बस और क्या था
नमक ही नमक

रुकना जरुरी था
कुछ समय के लिये
झील-झरनो के पास
ताकि मिठास नदी की बनी रहे
पर रफ़्तार ऐसी रही कि 
हवा की नमी तो गई
साथ ही
आंखो का पानी भी सूख गया

अनकहे की आवाज थी
अनसूने की कल्पना
और अनदेखे सपनो की पहचान पुरानी थी
पल पल बीतते वक्त मे
उसने बचा रखा था सब्र
पर तलाश खुद से खुद की रही

याददाश्त का जाना सदियो पुराना था
खुद के अन्दर
खुद को पाना मुश्किल ना था
कुछ यूं था कि
चिठ्ठी तो मिली गई 
पर मंजिल का पता ना था ! 

शामें जब खुबसूरत होती थी

आज बंजर जमीन की
घासे पीली थी
धरती सूखी, पर
रातें काली नही थी
उसने बचपन से ही
तारों के आसपास जीने की
आदत डाल रखी थी

हलांकि बचपन मे
सुबह,
फ़ूलो की खुशबू से होती थी
जो मां को 
पूजा के लिये चाहिये होता था
और शाम
पापा के आने के इन्तजार मे
खुबसूरत हो जाती थी
पापा शांत समन्दर की तरह
रिश्तो की शीतलता को
अपने अन्दर समेटे रखते थे
जो कि आज भी जारी है

और पेड की मोटी शाख की तरह थे
जिसपर हम बच्चे निडर होकर
नन्हें पंछियो की तरह
आकाश मे उडान भरने की
अथक प्रयास करते, ना थकते थे
जहां मेरी दुनिया 
ऊंची उडान भरती खुबसूरत रिश्तो मे बंधकर

आज मेरी शाखें जितना भी मजबूत है
सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे पापा की वजह से
शायद यही वजह है कि घर को घर बना रखा है
वरना इस बदलते बहरुपिये समाज मे

अब वक्त और प्रेम रिश्तो के पास है कहां !