सुनहरे सूरज का उगना रेशमी धागे पर

हम अपने बाहरी और भीतरी अस्तित्व से ही नही
बल्कि उस समाज से भी बनें हैं
जहां हमसब रहते हैं
और जिसकी संरचना से बाहर होने की कोशिश
एक छलावा हो सकती है
चाहे जिस रुप में साकार हो

पहचान तभी संभव है
जब तक सूरज है,
तमाम तरह के विमर्श में
सूरज को ध्यान में रखकर बात होती तो
संभवतनिष्कर्ष समाधान तक पहुंच पाती
परन्तु,अंधेरा इस कद्र हावी है कि
हमसब यहां तक भूल गये हैं कि
बगैर इसके एक काला घेरा मात्र हैं

पहाड हमारे अंधेरे से कतई नही बनता 
और ना ही
समन्दर और आकाश हमारे नजरिये से
इन सबके अस्तित्व में रौशनी है

गुफ़ायेंछुपने की जगह है
जिसका निर्माण हमसब ने स्वयं किया है
यानि अंधेरा स्वनिर्मित तो है ही
जिम्मेदार हमसब स्वयं ही है
रौशनी से दूर जाने की कवायद है
हमसब की है

भटकन हमारा अंधेरे में है
और रौशनी मंजिल
वहां तक हम पहुंचें,पर
उसके बीच की जमीनें स्वयं सुख के लिये
हमनें खोद डाली हैं

ख्वाब रौशनी है
तुम्हारे और हमारे बीच में
जो रेशमी धागा है
उसके ऊपर
एक सुनहरा सूरज उगता है

संभावना और पहाड़

वह उन समस्त संभावनाओं को
बचा लेना चाहती थी
जिनका अंत वर्षों पहले हो चुका था
और जिसके ना होने से
उथल पुथल मची थी
और मानवीय संवेदना का चेहरा पूर्णत: परिवर्तित हो चुका था
संभावनाओं के गुणतत्व में
वह सब कुछ था
जिससे हम और तुम बने थे


नदी थी
बयार थी
रौशनी था
वो तमाम पहाड़ थे
जिससे वह खुद को टिका कर रखी थी

दो भटके हुये
सफ़ेद हंस भी थे
जिनका तालाब के पास होने का मतलब
बसंत का होना था
कुछ ऐसा भी हो नाथा जैसे कि
मौन दीवरों पर दरवाजे और खिडकी का होना था
इसके आलावा
एक रौशनदान का होना
जहां से एक नन्ही गौरैया आती जाती थी!

रुह एक सफ़ेद बिन्दी है

धरती की सतह पर
जिस्म इंद्रियों का एक संग्रह भर
और इसका नष्ट होना
नई संभावनाओं को जन्म देना है
और आकाश के नीलेपन पर
रुह एक सफ़ेद बिंदी है

जब तक रौशनी है
उसकी सतह पर हरियाली है
पर शरीर का संबंध
अंधकार से है
जो तमाम बौद्धिक इतिहास पर 
कई प्रश्न छोडता है

पहचान अस्तित्व से है 
और रौशनी की सहभागिता
इसे संभव बनाती है
मैं कोई जिस्म नही
मिट्टी भर हूं
ख्वाहिश भी नही
उडती फ़िरती हवा भर हूं 

उसके लिखे से जन्मी
सीधे शब्दों में
शब्दों की
एक बिंदी भर हूं  
१२//२०१९

बनते बिगडते एहसास

आसमान से लगकर
टीकता वजूद मेरा 
पर उसके पहले
जमीन ने
हमें तोडा बहुत है 

यूं आये हो तो
बरस भी जाओ
काले साये का
डेरा बहुत है 

गिनते हुये एहसास
गिरते है जब
ऊंगलियों से छूटकर
क्या कहे
उन्हें जोडा बहुत है !

कितनी कमजोर हैं ये औरतें

लोटे में दुबका बैठा है समन्दर
और लोटे को सब भूल गये हैं 
क्योंकि चेतना धुंधली है 
जिन औरतों ने अपने पति को परमेश्वर माना है
और चांद को चांदनी में देखा है
वे ईर्ष्या करती हैं
चांदनी से
और कत्ल करती है अन्धेरे में
अपने भगवान की

सुबह सबेरे
सबसे पहले उठकर
काजल बिंदी और सिन्दूर लगाती है
और परायी औरतों पर शक भी
और घण्टों घुलती है तमाम तरह की तामझाम में
पर कितनी कमजोर हैं
ये औरतें

लोटे मे समन्दरउन औरतों की तरह है
जिन्हें यह पता ही नही कि वे समन्दर है
पर लोटे में कैद,

समन्दर में लोटा होता
तो बात कुछ और होती
और वक्त इतना धीरे नही बदलता और
लोटा भी नही खोता

कविता प्यासी रह गई

हम बादल थे 
बरस गये 
पर 
जमीन सूखी रह गई 

तेरे समान के तह में 
दुनिया जहान सब था 
शरीर कुछ भी ना था 
हमारे लिये 
इक रुह की प्यास में 
हम जुदा रह गये 

ओंस थे घास पर 
और नमी आंखों की 
शब्द शब्द पिघले 
पर 
पंक्तियों की कतार में 
कविता प्यासी रह गई!