वह गुनाह की तरह पन्नों में दर्ज होती गई

चाँद के दरवाजे पर
करवट बदलती रात
दाग चेहरे पर कैसे पडा उसके
ना उसे,ना अंधेरे को मालूम था
और ना ही चाँदनी को

फ़िर क्यों उसे याद रह गई
चंद बातें
कहानी में पतंग
और अंधेरे में हंसने वाली लडकी
तपते रेत पर मृग-मरीचिका थी और वही है
जिन दिनों कहानी लिखी जा रही थी
वह गुनाह की तरह
पन्नों में दर्ज होती गई
और अक्षरों में वह ताकत थी कि
उन्होंने जिस्म पहना दिया

अब बात रोने की है तो
चाँद पर ना रोये कोई
ना ही चाँद दाग़दार है
होगी कहानियां कई
चाँद पर
वह तो अकेला है तन्हा है
युगों से
पर सूरज के आस पास
गोल चक्कर काटता है

खींच लेता है वह
थोडा सा जमीन और आकाश
जहां वह तारे की शक्ल में टिमटीमाता है रोज
समन्दर शांत भाव से करवट बदलता है
उठता है तो उफ़नता है अकसर
और पछतावे के आग से भर जाता है

कई कई कवितायें एक साथ
स्वर-लहरियॊं मे गाती हैं
उसके रोने पर
कई फ़ूल गिर जाते हैं एक साथ
पर उसे यह नही पता कि
होंगे लाखों लोग ऐसे
जो भूख लगने पर हासिल करते हैं खाना
पर वह एक है
जो अपनी जिस्म में
सुरमयी शाम है ! 


और भूल गई प्रेम

सफ़ेद ख्वाबों का
वह शहज़ादा था
पर उसने
ख्वाबों को ही कतरन बना दिया
वर्षों रही तबाही
मौत के बेहद करीब रही
पल पल
और भूल गई प्रेम

मायूसियों से भरी शामें
डूबाती रही एहसास
बनते गये सब पत्थर
पर जीवन तो अंधेरे में ही
सांस लेती रही
जहां कोई नही था

तब उसने शब्दों का हाथ पकडा
नींद में करने लगी थी
इकठ्ठा कतरनों को
कि शायद
फ़िर से उन ख्वाबों को
पहनाया जा सके
कोई जिस्म
पहचानी जा सके जीवन !