शामें जब खुबसूरत होती थी

आज बंजर जमीन की
घासे पीली थी
धरती सूखी, पर
रातें काली नही थी
उसने बचपन से ही
तारों के आसपास जीने की
आदत डाल रखी थी

हलांकि बचपन मे
सुबह,
फ़ूलो की खुशबू से होती थी
जो मां को 
पूजा के लिये चाहिये होता था
और शाम
पापा के आने के इन्तजार मे
खुबसूरत हो जाती थी
पापा शांत समन्दर की तरह
रिश्तो की शीतलता को
अपने अन्दर समेटे रखते थे
जो कि आज भी जारी है

और पेड की मोटी शाख की तरह थे
जिसपर हम बच्चे निडर होकर
नन्हें पंछियो की तरह
आकाश मे उडान भरने की
अथक प्रयास करते, ना थकते थे
जहां मेरी दुनिया 
ऊंची उडान भरती खुबसूरत रिश्तो मे बंधकर

आज मेरी शाखें जितना भी मजबूत है
सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे पापा की वजह से
शायद यही वजह है कि घर को घर बना रखा है
वरना इस बदलते बहरुपिये समाज मे

अब वक्त और प्रेम रिश्तो के पास है कहां !

आग में जलना आसान होता है

पता नही कुछ औरतें किन किन काल खंडो के दुखो को
वे एक साथ सहन करती रहती है
और बावजूद इन दुखो के
वे किसी भी नशा के शिकार नही होती
वे अपनी यातना मे
थोडा मुस्कुरा ले और थोडा सज-संवर जाये तो
यकिन मानिये उनके कुछ रिश्तेदारो को
पक्कातौर पर यह लगता है
कि इनका दु:ख आडम्बर है
इसे तो इतना सुख-चैन है कि
यह तो हंसती भी है और लिप्सटिक भी लगाती है
ये पका अपनो को गलत साबित करना चाहती है!

आग मे जल जाना आसान होता है
आग के ताप के पास बैठना
बडा ही मुश्किल होता है बाबा

कुछ औरतें जो यकिननतौर पर
अल्प संख्यक होती है और इसलिये कि
उनका दु:ख अन्य कुछ औरतो से बिल्कुल भिन्न होता है
उन्हें इन यातनाओ के चक्रव्यूह तोडने नही आता
गर तोडने की कोशिश भी करे तो
डायन करार कर दी जाती है
या समाज से निकाली जाती है
क्योंकि उनकी चाहत
उन तमाम दु:खो से मुक्त होना होता है

आज भी ऐसे नजरियां वाले लोग है
जो अल्पसंख्यक औरतो को उनके दु:खों के साथ
पर्दे के पीछे रखने के जबरदस्त हिमायती है 
वे बेहद पढे लिखे लोग है या घरो के सर्वेसर्वा
या समाज के रखवाले है या मुखिया देश का
कोई भी हो सकता है !

बचाये रखी थी सांसे

सालो तक
एक नज़्म के साये में
पनाह ले रखी थी
नींद बड़ी ही मिठ्ठी थी
थपकियां उसकी
सपनों के दरवाजे खोलती थी

एक दिन
दरिया ने काट दिया
पूरा का पुरा जमीन
नज़्म दफ़न हो गयी थी

इंच इंच मौत के बीच 
दलदल में धंसती हुई
कई ज्वालामुखियों के बीच
छूटी हुई कोई रात थी 
ख़ाक हो गयी थी गहरे वीरानें में

उन नज़्मों का क्या
जिनका कोई अपना जमीन
कही और कभी ना मिला
जिनकी तलाश मे
वे सपना ही रही

समंदर उफनता रहा
जख्म किनारों को मिली 
जिन्दगी ने, अंतिम वार तक
बचाये रखी थी सांसे ! 

लौटना चाहते है तो घर

जाना किसी लौटने से कम ना हो
पर इस वक्त मे
सडके भी गुत्थियों से होकर जाती हैं 
और गुत्थियां कंदराओ मे ठहरा हुआ,घुप अंधेरा हैं

रौशनी, सूरज से जितना दूर
और ठहरा हुआ
कदम भी उतना ही घर से दूर
फ़िर भी हम लौटना चाहते है, तो घर
काश बचपनवाला घर लौटता
जहां सब कुछ सुन्दर ही होता था

सच 
सुन्दरता को बचाना कितना मुश्किल है
जैसे कविताओं मे
भाव से, शब्दो को कटने से बचाना 
अभी इस कटते वक्त मे
सिर्फ़ लौटना चाहते है तो घर

मां-पिता जी के संतोष से भरे 
नजरोंवाले घर मे
सुन्दरता को बचा लिये जाने वाले 
उस घर मे
जहां एक ही पल मे जमीन और आसमान
बडी आसानी से मिलता हुआ दिखाई दे जाते थे 

आज अगर
लौटना चाहते है तो 
सिर्फ़ घर !