आग में जलना आसान होता है

पता नही कुछ औरतें किन किन काल खंडो के दुखो को
वे एक साथ सहन करती रहती है
और बावजूद इन दुखो के
वे किसी भी नशा के शिकार नही होती
वे अपनी यातना मे
थोडा मुस्कुरा ले और थोडा सज-संवर जाये तो
यकिन मानिये उनके कुछ रिश्तेदारो को
पक्कातौर पर यह लगता है
कि इनका दु:ख आडम्बर है
इसे तो इतना सुख-चैन है कि
यह तो हंसती भी है और लिप्सटिक भी लगाती है
ये पका अपनो को गलत साबित करना चाहती है!

आग मे जल जाना आसान होता है
आग के ताप के पास बैठना
बडा ही मुश्किल होता है बाबा

कुछ औरतें जो यकिननतौर पर
अल्प संख्यक होती है और इसलिये कि
उनका दु:ख अन्य कुछ औरतो से बिल्कुल भिन्न होता है
उन्हें इन यातनाओ के चक्रव्यूह तोडने नही आता
गर तोडने की कोशिश भी करे तो
डायन करार कर दी जाती है
या समाज से निकाली जाती है
क्योंकि उनकी चाहत
उन तमाम दु:खो से मुक्त होना होता है

आज भी ऐसे नजरियां वाले लोग है
जो अल्पसंख्यक औरतो को उनके दु:खों के साथ
पर्दे के पीछे रखने के जबरदस्त हिमायती है 
वे बेहद पढे लिखे लोग है या घरो के सर्वेसर्वा
या समाज के रखवाले है या मुखिया देश का
कोई भी हो सकता है !

बचाये रखी थी सांसे

सालो तक
एक नज़्म के साये में
पनाह ले रखी थी
नींद बड़ी ही मिठ्ठी थी
थपकियां उसकी
सपनों के दरवाजे खोलती थी

एक दिन
दरिया ने काट दिया
पूरा का पुरा जमीन
नज़्म दफ़न हो गयी थी

इंच इंच मौत के बीच 
दलदल में धंसती हुई
कई ज्वालामुखियों के बीच
छूटी हुई कोई रात थी 
ख़ाक हो गयी थी गहरे वीरानें में

उन नज़्मों का क्या
जिनका कोई अपना जमीन
कही और कभी ना मिला
जिनकी तलाश मे
वे सपना ही रही

समंदर उफनता रहा
जख्म किनारों को मिली 
जिन्दगी ने, अंतिम वार तक
बचाये रखी थी सांसे ! 

लौटना चाहते है तो घर

जाना किसी लौटने से कम ना हो
पर इस वक्त मे
सडके भी गुत्थियों से होकर जाती हैं 
और गुत्थियां कंदराओ मे ठहरा हुआ,घुप अंधेरा हैं

रौशनी, सूरज से जितना दूर
और ठहरा हुआ
कदम भी उतना ही घर से दूर
फ़िर भी हम लौटना चाहते है, तो घर
काश बचपनवाला घर लौटता
जहां सब कुछ सुन्दर ही होता था

सच 
सुन्दरता को बचाना कितना मुश्किल है
जैसे कविताओं मे
भाव से, शब्दो को कटने से बचाना 
अभी इस कटते वक्त मे
सिर्फ़ लौटना चाहते है तो घर

मां-पिता जी के संतोष से भरे 
नजरोंवाले घर मे
सुन्दरता को बचा लिये जाने वाले 
उस घर मे
जहां एक ही पल मे जमीन और आसमान
बडी आसानी से मिलता हुआ दिखाई दे जाते थे 

आज अगर
लौटना चाहते है तो 
सिर्फ़ घर !

धडकन

हमारे मसीहा हमे भूलाते गये 
और हम मानो किसी नदी से बाहर आते गये
ठहर गई जिन्दगी वहां
जहां मरुस्थल सी ताप थी

सडक किसी विराने मे
अकेले कही किसी ओर चलती गई
बची हुई मुठ्ठी भर सपनीले रातों को
अब दरिया के किनारे रखूं या सूरज के सामने

हकीकत यह रहा कि
रौशनी और अन्धेरे के बीच
उलझती गई जिन्दगी यूं
कि साफ़ आइना भी धुंधलाने लगा

बचा सकते हो तो
पाषाण मे जीवित धडकनो को बचाओ
ना कोई यहां मसीहा है
और ना ही कोई तख्तोताज़
ना ही कोई हाथ है
और ना ही कोई द्वार
जो हमारे मुक्ति के दिन के साथी बने !

गर अंधेरे मे कोई नाच ना होती

दांत तले जुबान ना दबती 
असल मे एहसास खुबसूरत होते तो
वे कभी ना मुरझाते, साहब
ना यहां कोई जमीर बिकता
और ना ही अन्धेरे मे कोई नाच होती

हकिकत तो यह है कि
यहां रोज पिटारे से
रंग-बिरंगे फ़नोवाले
सांप निकलते है

इनकी जुगलबंदी से
धरती छलनी होती है
और आसमान तोले जाते है
हवा मे
विष की उमस इतनी की
बादल सूख जाते है और
जमीन बंजर होती चली जाती है

छांव कोई कल्पना है
अब जो सपनें मे भी नही मिलती है !

सरकार की सल्तनत में

आरजूओं को
रात में ढल जाने दो
सुबह की इन्तजार में
ताकि
कुछ शब्द जलते रहे
और कुछ शब्द बाकी रहे !

चमन हो और
ख्वाब भी हकीकत हो
यह मुमकीन नही
रात की विरानगी में
जुगनूओ का डेरा रहे
ताकि
चांद कुछ बाकी रहे !

ऐसी उम्मीद कि
लाठी मिले
मुफ़लिसी को
ताकि
उनकी आंख खुलती रहे
और सरकार की सल्तनत में
अल्पसंख्यकों की नींद सलामत रहे !

उन दीवारों पर

भीड़ बहुत है
सबने अपना अपना सामान बाँध लिया हैं
और जो छूट रहें है
उनका पता कही खो जायेगा गुमराह राहों के बीच


बहुत दूर जाना है
कही दूर मंजिल भी है
पर रास्तों का
कही कोई अपना ठिकाना भी तो नहीं है
वजह कुछ ऐसी है कि
सघन हताशा और निराशा के बीच सबको सफ़र करना है

घर के अन्दर कई दीवारे हैं
और उन दीवारों पर
तस्वीरें टिकती भी तो नहीं !