एक संवेदनशील वक्त में

कई लोग एक चित्र को
एक तरफ से देख रहे थे और
कई लोग दूसरी तरफ से
कुछ ऐसे भी लोग थे
जो एक चित्र को
कई कोनो से देख सकते थे
 

शीशे मे कैद अक्स
अकसर हमारे वजूद को हिला देता था
 

समाज अंधेरे मे रखा तरल पदार्थ है
जिसका कोई अपना ठोस आकार नही है
सिर्फ और सिर्फ नजरो का धोखा है
वर्चस्व के हाथो का खिलौना मात्र है 


संवेदनशील वक्त की तलाशी 
लेते वक्त 
इंसानियत की आँख 
लाल मिर्च के बीच 
थाली मे पड़े मिले !




4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (19-12-13) को टेस्ट - दिल्ली और जोहांसबर्ग का ( चर्चा - 1466 ) में "मयंक का कोना" पर भी है!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. अपना अपना नज़रिया पर फिर कई बार एक्सा ही दिखता है ...

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