वे तो बस चादर पर पड़ी सलवटें थी

आँगन में तुलसी मुरझाई हुई थी
पदचिन्हों के पीछे कही कोई
आवाज शेष नही थी
और दहलीज से पार
कही कोई महफूज शाखें नही बची थी

घटना कुछ ऐसी थी कि
ख्वाब से बाहर आते ही
चादर पर
सिलवटों का दिखना और
पृष्टभूमि से आती हुई
बिना सुरताल की आवाज का
कानों से टकराने जैसा था 

कही कोई सपाट
और सीधा रास्ता नही था
मासूम चिंट्टियों को बाहर आने के लिए
सारे रास्ते बंद किये जाते रहें थे अबतक

बारिश में
बंद दरवाजों से
जब भी वे बाहर आती थी
दीवारों पर
सीलन साफ नजर आता था !

12 comments:

  1. बारिश का मौसम और सीलन के निशान .............बहुत अच्छे । सुंदर अभिव्यक्ति ...जारी रहें । शुभकामनाएं

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (26-07-2014) को ""क़ायम दुआ-सलाम रहे.." (चर्चा मंच-1686) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने....

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  4. जाने कब से सूने, बेमतलब गुजरते लम्हों का अच्छा खाका खींचा आपने ।

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  5. बहुत ही उत्कृष्ट

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  7. मासूम चिंट्टियों को बाहर आने के लिए
    सारे रास्ते बंद किये जाते रहें थे अबतक
    ........................................।

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  8. ज़िन्दगी यही तो है ... सीलन भरी दिवार .. अपनी ही साँसों से टकराना ...

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  9. मासूम चिंट्टियों को बाहर आने के लिए
    सारे रास्ते बंद किये जाते रहें थे अबतक
    बेवजह आदमी कहाँ कहाँ किन किन ख्यालों से गुजर जाता है , बेहतरीन प्रस्तुति

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  10. वाह !बेहद खूबसूरत !

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