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उम्मीद से है दरख़्त अब

ठहरा हुआ आसमान
गहराती हुई पृथ्वी
सबकुछ बिखरता हुआ 

पिघलता हुआ बर्फ
हम कहाँ और कैसे ठहरे
सवाल ही रहा

ऐसी उफान नदियों में कि
सूखती रही उम्मीद 
लहरों के संग 

जंग में सियासत या
सियासत में जंग
बदल रहा है सबकुछ
अपने धूरी पर  

आसमान नीला रहे और
उडान मिलें परिंदो को
उम्मीद से है दरख्त अब !!