अक्षर की जान है

शब्दों ने अपनी मर्यादा तोडी
सिर्फ़ पहचान भर था
अटल था इरादा कि
चांद अपने जगह से ना हिले
ना ही तारों में कोई फ़ूट पडे
सिर्फ़ इसलिये कि
प्रलय के बाद मिलना हो
ना कोई बंधन टूटे
ना सूरज में ग्रहण लगे

शायद
पहचान मुकरर तारीख पर होना तय था
ऐसा कोई ख्वाब ना था कि
जिसमें अक्षर की जिस्म स्वाहा हो
पर उसे कैसे पता था कि
वर्षो पहले उसने जो कसम खायी थी
कमजोरियां कभी भी सिर पर सवार ना होंगी
और ना ही तुम और मैं के बीच
कही कोई फ़र्क आयेगा

दो अक्षर के जिस्म में एक जैसे शब्द
कायनात की कोई साजिश लगती है
कविता की अंतिम दो पंक्तियां
अक्षर की जान है

तुम्हें तो पता है कि
यह यकिन है
तुम्हारे आसमान पर
कही कोई बदहवासी के बादल ना आयेंगे
ना ही कही कोई चांद मुरझायेगा !

धीरे धीरे

तारों पर
खामोशी तैरती
और चाँद अपनी तन्हाई में  
जलता 
धीरे धीरे

तम के आगोश में
बेपनाह गहरापन
फ़िर भी
रात जवाँ होती 
धीरे धीरे

रात के गुलाबी जिस्म पर
टपकता खामोशियो के 
कुंवारे लम्स
तन्हाई बयाँ करती
धीरे धीरे

गुलाबी पन्नो के
नई दरख्त पर
एहसास लिपटें
धीरे धीरे

चल देते साथ गर
शब्द शब्द
तन्हाई खाक होती
धीरे धीरे !