शब्दों ने अपनी मर्यादा तोडी
सिर्फ़ पहचान भर था
अटल था इरादा कि
चांद अपने जगह से ना हिले
ना ही तारों में कोई फ़ूट पडे
सिर्फ़ इसलिये कि
प्रलय के बाद मिलना हो
ना कोई बंधन टूटे
ना सूरज में ग्रहण लगे
शायद
पहचान मुकरर तारीख पर होना तय था
ऐसा कोई ख्वाब ना था कि
जिसमें अक्षर की जिस्म स्वाहा हो
पर उसे कैसे पता था कि
वर्षो पहले उसने जो कसम खायी थी
कमजोरियां कभी भी सिर पर सवार ना होंगी
और ना ही तुम और मैं के बीच
कही कोई फ़र्क आयेगा
दो अक्षर के जिस्म में एक जैसे शब्द
कायनात की कोई साजिश लगती है
कविता की अंतिम दो पंक्तियां
अक्षर की जान है
तुम्हें तो पता है कि
यह यकिन है
तुम्हारे आसमान पर
कही कोई बदहवासी के बादल ना आयेंगे
ना ही कही कोई चांद मुरझायेगा
!