उसके सीने की गहराई में

पिघलते और ठिठुरते पहाड
बडे अच्छे लगते 
उनका पिघलना इसलिये कि
वे विशाल होते ह्र्दय से
ठिठुरना उनका
प्रतिनिधित्व करता आम आदमी का

पहाड था जहाँ उसका पुर्नजन्म हुआ था
नितांत अकेला ,नि:शब्द,शुन्य पर ठहरा
चेहरे का सवाल ही न था
पहाड था और युग धाराशायी सामने उसके 

कई मौसम एक साथ
साथ साथ चले
गहरे पहाडी में उतरते हुये
जब सुरंगमई आवाज़
दोंनों के बीच गहराने लगी थी
चीखती सन्नाटों के बीच
थामना उसका हाथ
हिमखण्डों का एक साथ
कई विशाकाय आकार में जम जाना था

ऊंचाई उसका निराकार
जन्म लेने लगी
उडते भागते शब्दों और अक्षरों में
दरअसल वह ठंडी हवाओं के साथ
पर लगाकर उडती और
शिखर से वह चीर और धीर
अचल देखता उसे

सूरज की तपिश से जब वह पिघलता
परिंदें बेशुमार उडतें
उसके दर्द के गवाह होते
ठंडी हवायें उसके गले लग जमनें लगती
वह बेजुबान और निराकार इतना अपना था कि
उसे पता ही ना था कि
बर्फ का एक छोटा टुकडा
उसके सीने के गहराई में छुपा बैठा है
जो पिघलता और ठिठुरता है मौसमों के साथ साथ !!

9 comments:

  1. उसे पता ही ना था कि
    बर्फ का एक छोटा टुकडा
    उसके सीने के गहराई में छुपा बैठा है
    जो पिघलता और ठिठुरता है मौसमों के साथ साथ !!
    बहुत सुन्दर...

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  2. सुंदर अभिव्यक्ति...

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  3. sarthak post aabhar .NAVSAMVATSAR KI HARDIK SHUBHKAMNAYEN !shradhey maa !

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  4. बढ़ी लगी यह रचना....पहाड़ों की तो बात ही क्या है!!!

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  5. उसे पता ही ना था कि
    बर्फ का एक छोटा टुकडा
    उसके सीने के गहराई में छुपा बैठा है
    बहुत सुन्दर ...

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