पर समंदर कहाँ है ?

रात की गहराई में
एक पुराने जर्जर किले से
एक परिंदा कूदता है
अद्वैत में और तड़पता है
जमीन बहुत सख्त है
जिस्म को खुरदुरा कर देती है
धायल पंखो से वक्त काटता है

बंद कमरों के झरोखें
नहीं खुलती हैं आसानी से
जकड़न है सदियों पुरानी 
पहचाने चेहरों पर गर्द जमी हुई है
और आइना धुंधला गया है

तोड़ना चाहता है वह
उन दीवारों को 
जहां उसे दफनाया गया था

उम्मीद की लहरें चाँद तारो को छूती है
पर जमीन और
आसमान के बीच की शुन्यता में 
यह तय नहीं कर पाता कि
उड़ान कितना बाकी है और लौटना कहां है ?

चारदीवारी की बीच बैठा परिंदा
परात में सज्जी पडी कई जोड़ी आँखों को देखता है
और सभी आँखें उसे देखती है
डूबना चाहता है 
पर समंदर कहाँ है ? 

12 comments:

  1. .बहुत सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति .आभार मुसलमान हिन्दू से कभी अलग नहीं #
    आप भी जानें संपत्ति का अधिकार -४.नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन खास है १ जुलाई - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. गहन भाव .... अभी समझने की कोशिश कर रही हूँ .... :)

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  4. बहुत उम्दा!! जिओ!!

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  5. ओह....! ये गहराई बिना समुन्द्र के ही....
    रहस्यवाद के रहस्यों से अठखेलिया करती रचना!
    कुँवर जी,

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  6. अच्छी रचना, बहुत सुंदर

    उत्तराखंड त्रासदी : TVस्टेशन ब्लाग पर जरूर पढ़िए " जल समाधि दो ऐसे मुख्यमंत्री को"
    http://tvstationlive.blogspot.in/2013/07/blog-post_1.html?showComment=1372748900818#c4686152787921745134

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  7. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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  8. बेहद खूबसूरत और गहन.

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  9. खुबसूरत अभिवयक्ति...... .

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  10. सूखी आँहों में समुंदर नहीं मिलता ... डूबने के लिए खुले समुंदर की जरूरत है ... गहरी रचना भाव ...

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  11. परिंदे से कहो समुंदर में डूबने के विचार मन से निकाल दे । कल को बारिश होगी, उसमें अपने विक्षत परों के धुल कर सुखा लेना, फिर सारा आकाश तुम्हारा होगा ।

    - पता नहीं मैं भावों को समझ सका या नहीं ।

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