कब्र तक जनाज़ा निकला

चिराग जलाये रखा
मद्धम आंच पर
भूख पकते रहे
उम्मीद में

वक्त बेरहम निकला
पत्थर तोड़ते वक्त
उम्मीद टाँकते रहे
मासूम हथेलियो पर
कई कई छाला निकला  

रिसते जख्म के चेहरे डरावने निकले 
वक्त कोई भी हो साहब
जख्म तो
हरहाल में जख्म निकला

ना उम्मीद जन्मी और ना इंकलाब निकला
मुफ़लिसी में सिर नीचे रही
ईमान की मौत में 
कब्र तक जनाज़ा निकला
 कांच के अक्स में 
और ना जाने क्या क्या निकला !

10 comments:

  1. बहुत ही खुबसूरत ख्यालो से रची रचना......

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  2. बहुत मर्मस्पर्शी रचना...बहुत सुन्दर

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  3. sundar bhavabhivyakti .aabhar

    http://bhartiynari.blogspot.com

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बृहस्पतिवार (07-11-2013) को  "दिमाग का फ्यूज़"  (चर्चा मंच 1422)      पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. बढ़िया प्रस्तुति-
    आभार महोदया-

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  6. दिल को छूते हुए शब्द ... लाजवाब रचना ...

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  7. कल 08/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  8. सुन्दर कवितायें

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