अक्षर की जान है

शब्दों ने अपनी मर्यादा तोडी
सिर्फ़ पहचान भर था
अटल था इरादा कि
चांद अपने जगह से ना हिले
ना ही तारों में कोई फ़ूट पडे
सिर्फ़ इसलिये कि
प्रलय के बाद मिलना हो
ना कोई बंधन टूटे
ना सूरज में ग्रहण लगे

शायद
पहचान मुकरर तारीख पर होना तय था
ऐसा कोई ख्वाब ना था कि
जिसमें अक्षर की जिस्म स्वाहा हो
पर उसे कैसे पता था कि
वर्षो पहले उसने जो कसम खायी थी
कमजोरियां कभी भी सिर पर सवार ना होंगी
और ना ही तुम और मैं के बीच
कही कोई फ़र्क आयेगा

दो अक्षर के जिस्म में एक जैसे शब्द
कायनात की कोई साजिश लगती है
कविता की अंतिम दो पंक्तियां
अक्षर की जान है

तुम्हें तो पता है कि
यह यकिन है
तुम्हारे आसमान पर
कही कोई बदहवासी के बादल ना आयेंगे
ना ही कही कोई चांद मुरझायेगा !

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (10-08-2018) को "कर्तव्यों के बिन नहीं, मिलते हैं अधिकार" (चर्चा अंक-3059) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नौ दशक पूर्व का काकोरी काण्ड और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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