एक दीपक जो रौशन रहा


घुप अंधेरे को
तलाश
एक सितारे की थी
पर वह हमेशा टूटता मिला

एक दीपक जलता है
रात भर
रौशन जमाने में
कौन सा अंधेरा था
जो दीप से रौशन रहा

हम बुझ जाये कि
मिट जाये
ये सवाल हमेशा दो तरफ़ा रहा
जैसे रात के बाद
दिन या दिन के बाद रात हुआ

सफ़र लम्बी है
अकसर सुनने को मिला
जिस्म के मिटते ही
मंजिल का गुमान ना रहा

है कोई जो साथ चलेगा
ताउम्र
हर एक की लिबास
यहां टुकडा-टुकडा मिला


3 comments:

  1. सफ़र लम्बी है
    अकसर सुनने को मिला
    जिस्म के मिटते ही
    मंजिल का गुमान ना रहा...गज़ब

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (21-08-2019) को "जानवर जैसा बनाती है सुरा" (चर्चा अंक- 3434) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन हर एक पल को अमर बनाते हैं चित्र - विश्व फोटोग्राफी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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