आसमान के नीचे की दुनिया सिमट गई थी
छ्तो की चौड़ाई बढती रही
और परिंदों के परों पर उड़ान भारी था
पत्थरों से टकराते रहे
सम्वेदी तंतुयें
प्यास बढ़ती रही और
पंख झड़ते रहे
बाजार की नजर में
दुनिया बिल्कुल गोल थी
और आदम जात एक वस्तु !!
छ्तो की चौड़ाई बढती रही
और परिंदों के परों पर उड़ान भारी था
पत्थरों से टकराते रहे
सम्वेदी तंतुयें
प्यास बढ़ती रही और
पंख झड़ते रहे
बाजार की नजर में
दुनिया बिल्कुल गोल थी
और आदम जात एक वस्तु !!