Showing posts with label गाँव. Show all posts
Showing posts with label गाँव. Show all posts

एक बुढि‌‌‌‌या कात रही हैं सुत

उम्र की सांझ ढल गई
तमाम रास्ते
चाक जिगर से
गाँव से दूर
नदी के किनारे 
एक बुढिया कात रही है सुत

गुजरे वक्त के
मौसमों ने
खुब कहर ढायें हैं
जल गयीं हैं जमीन और
आसमान के कई परतें
छांव कही खो गया है
और
वह कात रही है सुत

बेशुमार शोर के बीच
अश्क रिश्तों के बह चले है
और डुबने को है
लाज दहलीजों की
औंर
वह कात रही है सुत

अंधेरे में
जरुरतें दम तोड रही हैं
भूख और प्यास से
बिलख रहें हैं बच्चें नवजात
दीपक की बात्ति
कही खो गई हैं
औंर
वह कात रही है सुत

माँ के आइने में
जाने और पहचाने 
अक्स धुंधलाने लगे है
कभी हाँथो को
तो कभी आंखो को छूती है
झुर्रियों में वक्त का स्पर्श
अभी भी करवटें ले रहा है
और
वह कात रही है सुत!!!