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यह प्रेम ही तो है

यह प्रकृति का
प्रेम ही है कि
शाम
मंदिर और मस्जिद पर
समान रौशनी से आती है

रात भी दोनो को
साथ साथ गहरे उतारती है
चाँद
दोनो का एक ही होता है
तारो से भरे आसमान को
दोनो साथ साथ ओठते है

सुबह का सूरज भी एक ही होता है
और इसतरह सबको एक-दूसरे जोडती है