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तब होगी मुकम्मल

आह की तीर से
धायल पृथ्वी के लब पर
जब एक मुस्कान रिसेगी
तब एक कविता मुकम्मल बनेगी

दर्द के नीर में
आस की प्यास से 
जब एक नाव चलेगी
तब एक कविता मुकम्मल बनेगी

बंद दिलो के दरवाजो पर
राग और विराग से कोई दस्तक
नई धुन छेडेगी
तब एक कविता मुकम्मल बनेगी

नष्ट होते जंगलो में
ठूंठ दरख्तों पर
चिडियों के चहकने से
जब कोई सूरज निकलेगा
तब एक कविता मुकम्मल बनेगी

सूनी आंखो की
सूख गई पुतलियों में
जब अश्क उम्मीद बनकर तैरेंगें
तब एक कविता मुकम्मल बनेगी !!