शामें जब खुबसूरत होती थी

आज बंजर जमीन की
घासे पीली थी
धरती सूखी, पर
रातें काली नही थी
उसने बचपन से ही
तारों के आसपास जीने की
आदत डाल रखी थी

हलांकि बचपन मे
सुबह,
फ़ूलो की खुशबू से होती थी
जो मां को 
पूजा के लिये चाहिये होता था
और शाम
पापा के आने के इन्तजार मे
खुबसूरत हो जाती थी
पापा शांत समन्दर की तरह
रिश्तो की शीतलता को
अपने अन्दर समेटे रखते थे
जो कि आज भी जारी है

और पेड की मोटी शाख की तरह थे
जिसपर हम बच्चे निडर होकर
नन्हें पंछियो की तरह
आकाश मे उडान भरने की
अथक प्रयास करते, ना थकते थे
जहां मेरी दुनिया 
ऊंची उडान भरती खुबसूरत रिश्तो मे बंधकर

आज मेरी शाखें जितना भी मजबूत है
सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे पापा की वजह से
शायद यही वजह है कि घर को घर बना रखा है
वरना इस बदलते बहरुपिये समाज मे

अब वक्त और प्रेम रिश्तो के पास है कहां !

बचाये रखी थी सांसे

सालो तक
एक नज़्म के साये में
पनाह ले रखी थी
नींद बड़ी ही मिठ्ठी थी
थपकियां उसकी
सपनों के दरवाजे खोलती थी

एक दिन
दरिया ने काट दिया
पूरा का पुरा जमीन
नज़्म दफ़न हो गयी थी

इंच इंच मौत के बीच 
दलदल में धंसती हुई
कई ज्वालामुखियों के बीच
छूटी हुई कोई रात थी 
ख़ाक हो गयी थी गहरे वीरानें में

उन नज़्मों का क्या
जिनका कोई अपना जमीन
कही और कभी ना मिला
जिनकी तलाश मे
वे सपना ही रही

समंदर उफनता रहा
जख्म किनारों को मिला
जिन्दगी ने, अंतिम वार तक
बचाये रखी थी सांसे ! 

लौटना चाहते है तो घर

जाना किसी लौटने से कम ना हो
पर इस वक्त मे
सडके भी गुत्थियों से होकर जाती हैं 
और गुत्थियां कंदराओ मे ठहरा हुआ,घुप अंधेरा हैं

रौशनी, सूरज से जितना दूर
और ठहरा हुआ
कदम भी उतना ही घर से दूर
फ़िर भी हम लौटना चाहते है, तो घर
काश बचपनवाला घर लौटता
जहां सब कुछ सुन्दर ही होता था

सच 
सुन्दरता को बचाना कितना मुश्किल है
जैसे कविताओं मे
भाव से, शब्दो को कटने से बचाना 
अभी इस कटते वक्त मे
सिर्फ़ लौटना चाहते है तो घर

मां-पिता जी के संतोष से भरे 
नजरोंवाले घर मे
सुन्दरता को बचा लिये जाने वाले 
उस घर मे
जहां एक ही पल मे जमीन और आसमान
बडी आसानी से मिलता हुआ दिखाई दे जाते थे 

आज अगर
लौटना चाहते है तो 
सिर्फ़ घर !

धडकन

हमारे मसीहा हमे भूलाते गये 
और हम मानो किसी नदी से बाहर आते गये
ठहर गई जिन्दगी वहां
जहां मरुस्थल सी ताप थी

सडक किसी विराने मे
अकेले कही किसी ओर चलती गई
बची हुई मुठ्ठी भर सपनीले रातों को
अब दरिया के किनारे रखूं या सूरज के सामने

हकीकत यह रहा कि
रौशनी और अन्धेरे के बीच
उलझती गई जिन्दगी यूं
कि साफ़ आइना भी धुंधलाने लगा

बचा सकते हो तो
पाषाण मे जीवित धडकनो को बचाओ
ना कोई यहां मसीहा है
और ना ही कोई तख्तोताज़
ना ही कोई हाथ है
और ना ही कोई द्वार
जो हमारे मुक्ति के दिन के साथी बने !

गर अंधेरे मे कोई नाच ना होती

दांत तले जुबान ना दबती 
असल में
एहसास खुबसूरत होती तो
फ़ूल नाजुक है
वे कभी ना मुरझाते, साहब
ना यहां कोई जमीर बिकता
और ना ही अंधेरें मे कोई नाच होती

हकिकत तो यह है कि
यहां रोज पिटारे से
रंग-बिरंगे फ़नोवाले
सांप निकलते है

इनकी जुगलबंदी से
धरती छलनी होती है
और आसमान तौला जाता है
हवा में
विष की उमस इतनी की
बादल सूख जाता है और
जमीन बंजर होती चली जाती है

पेड़ काटे गये असीमित
छांव कोई कल्पना है, अब 
जो सपनें मे भी नही मिलती है !