बनी दुनियाँ तब खुशबू बहुत थी

बिखरना
नसीब फूलों का
माली नही वे कि सँवार देंगें
हौसलों को उड़ान देंगें

मंझधार में
छोड़ रहे कस्तियों को
बुझाते रहें रौशनी
टटोलते हुये अंधेरों को

बाबूल से
बबुल हुये वे कब
कंटीली ढाँचों के बीच 
बसा फूल का शहर  

बनी दुनिया तब 
खुशबू बहुत थी !

12 comments:

  1. बनी दुनिया तब
    खुशबू बहुत थी !

    वाह.....बेहद खूबसूरत पंक्तियाँ.....
    अनु

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  2. बहुत खूब ... प्रतीक के माध्यम से बात करने का प्रयाद ... लाजवाब ...

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  3. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!
    शुभकामनायें.

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार १४/८/१२ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी आपका स्वागत है|

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  5. बेजोड़ भावाभियक्ति....

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  6. गूढ़ भाव लिए बेहतरीन !

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  7. प्रभावशाली रचना ...शुभकामनाएं जी /

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  8. ...

    बनी दुनियाँ तब खुशबू बहुत थी
    बिखरना
    नसीब फूलो का
    माली नही वे कि
    सँवार देंगें
    हौसलों को उड़ान देंगें

    मंझघार में
    छोडते रहे कस्तियों को
    बुझाते रहें रौशनी
    टटोलते हुये अंधेरों को

    बाबूल से
    बबूल हुये वे कब
    कंटिली ढाँचों के बीच अब
    बसा फूलो का शहर

    बनी दुनिया तब
    खुशबू बहुत थी !बहुत सुन्दर भाव व्यंजना लिए है रचना ,बधाई .
    शद्ध कर लें वर्तनी ...कविता और उड़ान भरे ...
    बिखरना नसीब "फूलों "का
    माली "नहीं " वे ...

    "मंझधार" में ...'

    "छोड़ते " रहे "कश्तियों" को वे ...
    बुझाते "रहे ".......रौशनी

    "कंटीली "........शुक्रिया .....




    ,ram ram bhai
    मंगलवार, 14 अगस्त 2012
    क्या है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा की बुनियाद ?
    http://veerubhai1947.blogspot.com/

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  9. बेहतरीन प्रस्तुति ....आभार

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