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बनी दुनियाँ तब खुशबू बहुत थी

बिखरना
नसीब फूलों का
माली नही वे कि सँवार देंगें
हौसलों को उड़ान देंगें

मंझधार में
छोड़ रहे कस्तियों को
बुझाते रहें रौशनी
टटोलते हुये अंधेरों को

बाबूल से
बबुल हुये वे कब
कंटीली ढाँचों के बीच 
बसा फूल का शहर  

बनी दुनिया तब 
खुशबू बहुत थी !

वही जहाँ तुम्हारा आना जाना है

कौन से कोने में
छुपाऊ
सफेद कबूतरों को 
रह सके, सफेद
और बदले नही
उनकी दुनिया
ऐसा मुकम्मल जहाँ
कहाँ से लाऊँ

भोर के होते ही
घण्टालो के बीच
दब जाती है सुहानी सुबह
शोर के साथ 
दिन की शुरुआत
रास्तो पर बिखर जाती है
मासूम हंसी
और
कुचलते जाते हैं
निर्मम पैर

उन्हें पता है कि
तपिश क्या होती है
पर क्या करे
सूरज थोडा और गर्म होता जाता है

सोचती हूँ एक सूराख बनाऊ
हिमखण्डो के बीच
कंचनजंघा पर रख उन्हें
सौप दूँ तुम्हारे विशाल आगोश में
और सो जाऊ एक गहरी नींद
वही
जहाँ तुम्हारा आना जाना है !! 

मिट्टी में कैद खुशबू

1.
शब्दो के हंस
झील में कबसे से है
कुछ ठीक ठीक याद नही !!

2.

गमों को कुछ
यूँ दफनाया
कि
किताब में खिलकर
फूल हुआ !

3.

किनारो की बेबसी ऐसी
कि
तुफानो को समेटे हुये है !

4.

रात की स्याही
बढती जाये
सुबह का बादल
जमते जाये
सपनो के तारे बिखरे पडे हैं
पर
आस का चाँद
डुब ना पाये !

5.

तपिश बढती रही
जिंदगी की नमी को
बादल ने चुरा लिया था !

6.

एक दीवार थी कही
गिरा दिया उसने
जिंदगी से भरी
रौशन शब्दों से
रु-ब-रु होती रही !

7.

चिंटियाँ जमीन को
खोंखला करती रही
सुबह सुबकती रही
समंदर उफनता रहा
खोखली जमीन पर
भुकम्प के झटके लगते रहे
दीवारें दरकने लगी है अब !

रौशन रहे तू

दीपक की तरह
रौशन रहे तू
गहरे अंधकार पर
तेरी जीत ही लहराये

जले तू इस तरह कि
तेरे करीब से
वह कोसो दूर नजर आये

जल जाये रात सारी
तेरी इक टिमटीमाहट में
उग जाय एक सूरज
और नया सबेरा हो !

सांसों में घुली रेखायें

आड़ी और तिरछी रेखाओं के बीच 
कुछ रेखायें सामानांतर भी चलती है
कहीं  तक जाती हुई
वे जोडती है
समानांतर चल रही रेखाओ को
जुटना और टुटना भी पडता है
कई बार इनके गणित में फंसकर 

अब क्या कहें किसे कहें
हर जगह पर है आड़ी तिरछी रेखायें
जिसमें फंसे हुये विवश महीन धागें 
हवा अब सांस लेने की कला से आती है

सीधी और सरल चलने वाली रेखायें
फंस जाती है अक्सर
अनसुलझी रेखाओ के वक्राकार के बीच
फंसी सांसे और उलझी रेखायें 
निहारती है आसमान घण्टों
शायद वह टपके और डूब जाये

ऐसा कुछ नही होता जिससे वे
अपने गहन पीड़ा से बाहर आ सके
जब तक सांस चलेगी  
आसमान शांत स्थिर
और अविचलित मुद्रा में
निहारता रहेगा उन्हें वर्षो

दूर बैठें शाख पर एक परिंदा
उड जाता हो महीन धागों से परे 
बेबस असहाय और निरीह छोड़कर
तब अपने दर्द में डूबते हो खोजते हुये
कुछ गांठें जिन्हें खोल दिये जाने से
पृथ्वी का हरा होना तय हो

बरबस बरसती है अश्क 
बहने लगती है नदियाँ
समानांतर रेखाओ के बीच !!

ये जिंदगी भी न

कहते कहते कुछ
बेआवाज हो जाती है 
तब उड़ती चिडियों को
देखने लगती है एकटक
फिर उंगलियों को चेहरे पर फिराती है
और गीले होने के एहसास से
होठो को  चौड़ाकर
एक उदास मुस्कान
छोड देती है कई जोडी आंखो के बीच

इसतरह कुछ
सुबह से शाम तक के टिक टिक पर
जिंदगी की कढ़हाई में पकती है लगातार
घण्टों,दिनों,महीनों और सालों
तब कहीं वह परिपक्व होती है

छोटी छोटी बातों को निगलते हुये
और बड़ी बातों से फटी चादर को सिलते हुये
निकलना होता है रोज
मंजिल तय करने के वास्ते
पहचाने चेंहरो के बीच
अंजाने सफ़र पर
ये जिंदगी भी न !!

चल कही और चले

गमों से पार चले
ए हवा
चल कही और चले

उल्झी सांसो की
गुंथियों की जाल से
पार चले
ए हवा
चल कही और चले

बंजर भुमि की कोख में
लगी आग से
कही पार चले
ए हवा
चल कही और चले

निकल चली है
कई रस्मो-रवायते ऐसी की
शुल जिगर के पार चले
ए हवा
चल कही और चले 

मुद्दतो से वे छींटते रहे है 
बारुद यहाँ वहाँ
फटने से पार चले
ए हवा
चल  कही और चले

हमने भी इक बनाई है
रौशन चमन जहाँ में
ए हवा
चल उसी के आस-पास चले !!

अय नदी

गमों से पार हो
अय नदी

जीवन में धार हो
अय नदी

गुजर जाये गर मझधार हो
अय नदी

बन जा सुर ताल
अय नदी

कलकल हो सांसे
अय नदी

गरीबी हो पार
अय नदी

शियासत तू डुबा
अय नदी

बन जा तारण हार
अय नदी

जंगल हो आर पार
अय नदी

पृथ्वी की तू श्रृन्गार
अय नदी

सदियों की गवाह तू
अय नदी

चढे परतों को तू धो
अय नदी

सूखी जमीनें नम कर
अय नदी

मानवियता हो संग संग
अय नदी

सपाट कर गमों के पहाड
अय नदी

वक्त का तू आईना बन
अय नदी

तानाशाहो को दिखा तू
अक्स
अय नदी !!

भारत मेरा देश

भारत मेरा देश
मेरी बेटियों सा दिखता है मुझे
उनके नाजुक हाथो में
खींची लकीरो जैसा ही तो हैं
उसका आने वाला सबेरा

आंखो में रौशन खुशी जैसा ही
इसकी प्रकृति सम्पदा
उनकी हथेलियों सी नरम
इसके पावन धरती
अपार सुकून जैसे
क्षितिज पर विस्तार इसका
खिलखिलाती है तो
मुझे तिरंगे की याद दिलाती है

पर जब मै ख्यालों में
इन्हे बडा होते देखती हूँ तो
डर से भर उठती हूँ
इनकी सुरक्षा को लेकर
तब भी मेरा देश भारत
मुझे याद आता है !!!