लिबास

लिबास फिर उतर गया
एक और दिन ढ़ल गया 

शाम से विदा लिया
भोर फिर बिकल हुआ
नयी सुबह फिर हुई

पहचान फिर बदल गया
कहाँ कहाँ खोजूं तुझे
तपिश भरी दोपहरी में
सफ़र को फिर निकल पड़े
मंजिल की प्यास लिये

धूप छांव घना कही
उम्मीद बड़ी है रात नई 
वह सुबह कभी तो आयेगी !!

9 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    गणेशचतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  2. लाइनें अच्छी बन पड़ी हैं। कुछ औऱ बेहतर हो सकती थीं। नहीं क्या?

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  3. उम्मीद बड़ी है रात नई
    वह सुबह कभी तो आयेगी !!
    bahut sundar......

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  4. सुबह जरूर आती है ...
    आशा बनी रहे ...

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  5. कल 21/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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