रुह एक सफ़ेद बिन्दी है

धरती की सतह पर
जिस्म इंद्रियों का एक संग्रह भर
और इसका नष्ट होना
नई संभावनाओं को जन्म देना है
और आकाश के नीलेपन पर
रुह एक सफ़ेद बिंदी है

जब तक रौशनी है
उसकी सतह पर हरियाली है
पर शरीर का संबंध
अंधकार से है
जो तमाम बौद्धिक इतिहास पर 
कई प्रश्न छोडता है

पहचान अस्तित्व से है 
और रौशनी की सहभागिता
इसे संभव बनाती है
मैं कोई जिस्म नही
मिट्टी भर हूं
ख्वाहिश भी नही
उडती फ़िरती हवा भर हूं 

उसके लिखे से जन्मी
सीधे शब्दों में
शब्दों की
एक बिंदी भर हूं  
१२//२०१९

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना 👌
    सादर

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 12/06/2019 की बुलेटिन, " १२ जून - विश्व बालश्रम दिवस और हम - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. वाह!!बहुत खूब!

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  4. पहचान अस्तित्व से है। रूह एक सफेद बिंदी है। उम्दा।

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (14-06-2019) को "काला अक्षर भैंस बराबर" (चर्चा अंक- 3366) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. अति सुंदर लेख

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  7. वैसे आपको यह लेख लगता है तो क्या किया जा सकता है आपका ग्यान विस्तRiत कुछ ज्यादा है और हम जैसे तो अपने को कुछ कहने से रहे ! आभार !

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  8. यही बिंदी जब आकर लेकर फैटी है .... शब्द शब्द जीवन बन जाती है ...
    अच्छा लिखा है ...

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