बनते बिगडते एहसास

आसमान से लगकर
टीकता वजूद मेरा 
पर उसके पहले
जमीन ने
हमें तोडा बहुत है 

यूं आये हो तो
बरस भी जाओ
काले साये का
डेरा बहुत है 

गिनते हुये एहसास
गिरते है जब
ऊंगलियों से छूटकर
क्या कहे
उन्हें जोडा बहुत है !

3 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 08/05/2019 की बुलेटिन, " पैरंट्स टीचर मीटिंग - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आवश्यक सूचना :

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