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आशा टिमटिमाती रही

कई आंखे निकल आयी थी 
तस्वीरों में
पर कमरा भरा था अंधेरो से
जुगनूये माँ बन गयी थी आंखो की
घुप अंधेरा गहरा रहा 
पर आशा टिमटिमाती रही 
बंद कमरो में और
आत्मा अंधेरो मे
प्रदिप्त थी
ऊँमकार स्वरूप !!

आनाथ स्पर्श

तस्वीरों की सच खोजती दीवारें
बनावाटी सच पर मिट्टी की खुशबू
आसमान से बरसते अन्नाजों  पर
राजनीति के दाल का काला और महंगा हो जाना

बढते भूखे-नंगो की गंगा-जमुनी प्रवाह में
जीवन को तलाशती आंखें

पिघलती सांसो मे शीशें का घुलना
बिलखते सपनों में गहराते अंधेरें
माँ की लाठी से गुम होती आवाज

बढते लोगों की तदाद में
अकेलेपन की बाढ से झुलसती अपनापन

और आनाथ स्पर्श से डर का खत्म हो जाना !!