सुबह से शाम हुई
कलरव में
देखते हुये
तुझें
कई शाम
कंधो पर
लेकर बैठी है जो
आसमान
ओंस की मानिंद
काटी है यादें
कोई सीप
तुझ सा ना मिला
कि बन जायें
मोती
लहरों की
साजिश में
लौट जाता है वक्त
किनारों से
ठोकर खाकर
किनारे देखती रही हैं तुम्हें
सुबह और शाम में
उगते और डूबतें !!
कलरव में
देखते हुये
तुझें
कई शाम
कंधो पर
लेकर बैठी है जो
आसमान
ओंस की मानिंद
काटी है यादें
कोई सीप
तुझ सा ना मिला
कि बन जायें
मोती
लहरों की
साजिश में
लौट जाता है वक्त
किनारों से
ठोकर खाकर
किनारे देखती रही हैं तुम्हें
सुबह और शाम में
उगते और डूबतें !!