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तब माँ बहुत याद आती है

चाँदनी के वीराने में
दर्द के सिरहाने पर
जब कोई तितली उडती है
और कंधो के आस पास मंडराती है
तब माँ बहुत याद आती है

उडती है खुश खुश
बेहिसाब गमों के बीच
एक तितली
फड़फड़ाती पंखो से जब कही कुछ बोल जाती है 
तब माँ बहुत याद आती है

वह बैठती है
पलकों पर सुबह सबेरे 
अश्को की नमी मे
मायूसी के मौसम में 
जब पंखो से रंग उसके झर जाते है
तब माँ बहुत याद आती है

पूजा की थाली में
माली के फूलों की खुशबू पर
जब कोई तितली मंडराती है 
तब माँ बहुत याद आती है
 
फूल की कशिश और  
खुशबूओं की चाहत में       
बेटियों के स्पर्श से जब
कोई तितली रंग बिरंगी हो जाती है 
तब माँ बहुत याद आती है
 
सपनों के रंगो से
दिन-रात की चादर पर
जब कोई तितली नया रंग भर जाती  है
तब माँ बहुत याद आती है

प्यार की धून पर
तितली के थिरकन से
मन फूल सा खिल जाता है
और तब वह
दूर दूर तक जाकर लौट आती है
तब माँ बहुत याद आती है !!
 

तेरा उगना और डूबना

सुबह से शाम हुई
कलरव में
देखते हुये
तुझें 

कई शाम
कंधो पर
लेकर बैठी है जो
आसमान
ओंस की मानिंद
काटी है यादें

कोई सीप
तुझ सा ना मिला
कि बन जायें
मोती

लहरों की
साजिश में
लौट जाता है वक्त  
किनारों से
ठोकर खाकर 

किनारे देखती रही हैं तुम्हें
सुबह और शाम में
उगते और डूबतें !!