कुर्सियों के बीच
जमघट पत्थरों की थी
विस्फोटकतंत्र था शहर
गाँव उदास जलता रहा
पगडंडियों से
पदचिन्हें विलुप्त होने लगी थी
जंगलवाद के वितान पर
जंगल लुप्त
चीख पुकार से
वे भयभित नही थे
उनका नया शौक था
शिगार फुकते हुये
नसलो को धुँआ में उडाना
वे आभागे लोग थे
जिनके पास घुमती गोल पृथ्वी नही थी
उनका लौटना किसी सुबह हो सके !!
जमघट पत्थरों की थी
विस्फोटकतंत्र था शहर
गाँव उदास जलता रहा
पगडंडियों से
पदचिन्हें विलुप्त होने लगी थी
जंगलवाद के वितान पर
जंगल लुप्त
चीख पुकार से
वे भयभित नही थे
उनका नया शौक था
शिगार फुकते हुये
नसलो को धुँआ में उडाना
वे आभागे लोग थे
जिनके पास घुमती गोल पृथ्वी नही थी
उनका लौटना किसी सुबह हो सके !!