Showing posts with label लुप्त. Show all posts
Showing posts with label लुप्त. Show all posts

जंगलवाद के वितान पर

कुर्सियों के बीच
जमघट पत्थरों की थी
विस्फोटकतंत्र था शहर 
गाँव उदास जलता रहा
पगडंडियों से
पदचिन्हें विलुप्त होने लगी थी

जंगलवाद के वितान पर
जंगल लुप्त
चीख पुकार से
वे भयभित नही थे
उनका नया शौक था 
शिगार फुकते हुये
नसलो को धुँआ में उडाना

वे आभागे लोग थे
जिनके पास घुमती गोल पृथ्वी नही थी
उनका लौटना किसी सुबह हो सके !!