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उतरने के लिये बुद्ध होना जरूरी था

त्रिकोण हवा में लहराता रहा
एक सिरे से
मानो कोई पोस्टर हो
जिसपर जिंदगी छपी थी और 
बेबसी टंगी

अट्टालिकाओ के बीच
हवा में परेशानियाँ घुली हुई थी 
दीवारों के बीच जिंदगियाँ चून दी गई थ
मुर्दे चलते थे
और वक्त दो धारी तलवार 
अंदर और बाहर के बीच 
दरवाजे पर लटकता रहा

सड‌क पर लोग गोल गोल चलते थे
झुंड़ से बाहर आना
उनके लिये मुमकीन ना था
किताबों में ऐसा ही लिखा था
और युग यूँ ही बीत गया था

बच्चों को कोलाहल रहस्य लगता
मुठ्ठियों में उत्साह लिये 
वे बड़ा होना चाहते थे
हलांकि जिंदगी
सबसे अलग अलग लिबास में मिलती थी

प्रकाश के ऊपर
ज्ञान की स्याही पोती गई थी
जो जितना ही समझना चाहता
उतना ही उलझता रेशमी घागों के बीच

रस्सियाँ बांध दी गई थी
चलना शेष
और उतरने के लिये
बुद्ध होना जरूरी था !!

एक पूरे दिन में

हरतरफ कुछ बह रहा है
सूख - सूखकर
वह मंत्र भी जिसने दुनिया को
चलना सिखाया

देखो ना
उस पुराने किले के बाहर
जो नदी थी ना
जिसमे बुद्ध का अहिंसा वाला मंत्र भी सूख गया और
जमीन फट गई है

आसमान का नीलापन भी धुंधला गया है
वही हमारे हाथो के बीच का
तुम और मै भी
भूरे रंग की दुविधा में झूल रहे है

शीशे में किसी भी अक्स का चेहरा साफ जो नही है
जमीन से जुडी हर चीज
पृथ्वी की बढती ताप से
भाप बनके उड जो रहे हैं

सबने तो अपनी अपनी कह ली
प्रश्न तो यह है कि
बापू की बहुत सारी बातो से
सहमत तो है हम सब
पर कितने कदम चल पाते है
एक पूरे दिन में !!