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ठहर तो सही सफर अभी बाकी है

ठहर तो सही
सफर लम्बी है
धूप बेसुमार
चिलचिलाती छाँव से
थकान प्यासी है

अगले दो कदम पर बादल मिलेंगे
सूना है वे
ठंडी हवायें ढोते हैं पानी नही
चाहत है उन्हे भी देख लूँ जरा

प्याउ है उधर
जा थोडा पानी पी ले
सफर हैं तो प्यास लगेगी ना

जल्दी जाने की चाहत मत रख
वरना  पैर
कंटीले वक्त से
जख्मी हो जायेंगे
आखिर चाहत अंधी और बहरी
जो ठहरी

देखा..... ना
कल ही तो
हिमालय से आनेवाली ब्यार
लहूलुहान पडी मिली थी
छूट चुकी चौराहें पर

सफर मे कई आंखो का होना
जरूरी सा लगता है अब
है ना....