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जो हासिये पर नही जीते

दरअसल वह आसमान की आंख से
विसंगतियों पर पत्थर की तरह चोट करता
ऐसा जब जब करता था यकीन मानो
दोंनों जहाँ धुँआ धुँआ होता था  

उतना ही पढा उसने
जितना उसने सपनों को बुना था
जल में बनें महल की तरह लिखता  
बुलबुले की तरह आसपास बिखरता
छुते ही इंद्रधनुषी होता चमकता सतरंगी 

परिकथाओं से दूर कही
पहाडों की खोह में रहने वाले बच्चों की
दस्तान से भरी गीतों में सुरमई धुन हो
लकीरों से झांकती आंखों की चित्र खिंचता 
जड-जमीन को खोदता और कुछ सूखी जडें निकालता
बढता जाता सात समन्दर  

चाय की दुकानों पर काम करने वाले
छोटूओं के माँ-बाप पैदाईशी ही लुले-लंगडे होते  
उनके घरों में भूख सेंकने के लिये
हाथ पैदा करना होता था काम
और कच्ची उम्र का मेहतना
पेट की आग पर पानी बन बरसता
ऐसे में वह रुई से पानी निचोंडता 
रुखे और सूखे दर्द पर फेरता हाथ कुछ ऐसे कि
गंगा भी हिमालय से फुट पडती
जो आजकल सूखी पडी है कही

संस्कार दुनिया का
तोता बनाना
और भेंड चालवाले पिंजडों में कैद करना 
तोतों को
है ना मुनाफे का सौदा
जो हासियें पर नही जीते
उन्हें पिंजडो का सौदा करना अच्छी तरह आता !!

ठहर तो सही सफर अभी बाकी है

ठहर तो सही
सफर लम्बी है
धूप बेसुमार
चिलचिलाती छाँव से
थकान प्यासी है

अगले दो कदम पर बादल मिलेंगे
सूना है वे
ठंडी हवायें ढोते हैं पानी नही
चाहत है उन्हे भी देख लूँ जरा

प्याउ है उधर
जा थोडा पानी पी ले
सफर हैं तो प्यास लगेगी ना

जल्दी जाने की चाहत मत रख
वरना  पैर
कंटीले वक्त से
जख्मी हो जायेंगे
आखिर चाहत अंधी और बहरी
जो ठहरी

देखा..... ना
कल ही तो
हिमालय से आनेवाली ब्यार
लहूलुहान पडी मिली थी
छूट चुकी चौराहें पर

सफर मे कई आंखो का होना
जरूरी सा लगता है अब
है ना....