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कुछ सामान था जो सफ़र में छूट गये कही

शाम के धुंधलके में
उसने परिंदो को सिद्दत से देखा
सभी लौट रहे थे
बदलियों के पीछे से आती लाल रौशनी
रातरानी से लिपट रही थी

झरने के सुमधूर लय ताल के साथ
कई-कई नदियाँ एक साथ बहे जा रही थी
आसमान मुस्कुराते हुये
तारों को एक एक कर
चांदनी के आंचल पर टांकता जा रहा था
चांद सागर से मिलन की चाह लिये
छ्लकता रहा रातभर

उसने जमीन और आसमान को
आंखो में कैद कर लिया
गोल मोतियों को
दफन कर पृथ्वी के सीने में
हरी घासों में लहलहाती रहीं वह
हिरणों के नन्हें पाँव कोमल जो थे

सूरज उसके अर्श और फ़र्श  में
कही खो सा गया था
कुछ सामान थे जो
सफ़र में छुट गये कही !!

भूख हो कविता

लिख दो वह सब
जहाँ भूख ना जलती हो
मन की आग पर

भूख हो
एक कविता
जिसे सुबह शाम पढी जाये

जिसे कमाने निकले
सुबह को
लौटना हो जिसपर
सांझ को

सकून से सोये
रात को
गर्वांवित होये कविता !!

जहाँ सूरज डूबेगा

मजमा है
निराशा और आशा का
कस्बा में सुबह से ही 
चहल पहल बढ गई है

हवा पतियों पर झुल रही है
शाखो पर कोंपले
जाने पहचाने शक्लों से 
गुफ्तगू कर रहें है

ऋतुओं के आने का वक्त तय है
वे बेवक्त नही आती
सूरज शाम के आते ही डुब जाता
समंदर में
अंधेरे ढुंढ लेते तारों को
रात गहराने पर 

मजमा में आये लोग
कतार में है
उन्हे चलना है अभी
दूर तक 
जहाँ सूरज डूबेगा 
शाम का होना तय है !!!