Showing posts with label सांस. Show all posts
Showing posts with label सांस. Show all posts

एक मुठ्ठी धूप में सूरज तन्हा

एक मुठ्ठी धूप में
सूरज तन्हा
आसमानी कंचन-किरणवाला
सबेरा
सूरजमुखी जैसा

ठंडी हवाओं में
पत्तियों की सरसराहट से होकर
गुजरती सांसे
बेआवाज
सन्नाटों पर फैला
पानी सा इक छुअन

पलकों पर सोया समंदर
और उसके गहराई में
डुबता नीला आसमान
तारों से सजी रात
तन्हाई से बचाती हुई चाँद को
टांकते जाती शब्दो से
रौंशन मुखडा को
टिमटिमाते अक्षरों से

वक्त के हाँडी मे
पकता महीन सेवईयाँ
जिसे हमसब को खाना होता है
खींच-खींचकर
पर दूँज की तरह मीठा नही होता

बेरोक-टोक चलती है घडियाँ
जिसके ऊपर
घोडे भी दौडते है
पर बिना लगाम
वे माँ की हाथ के तरह
खुबसूरत नही होते !!

उनके चेहरे पर सपने

आज भीड है हर जगह
और उनके चेहरे पर सपने
जेबे तलाशती हुई
पर उसमे सिर्फ बचे
ईंट पत्थर

हाशिये से बाहर लोग
अब बस भीड का हिस्सा है
बदहवास सांसो की जमीन पर
सपने में सिर्फ भूख है
और उनके जलते पेट को  
एक पूरी नींद मय्यसर नही
कि ख्वाब में भी पूरा चाँद सा थाली मिले

आंख और
उनके सपनों के बीच जब
उनकी कुतर दिये गये जेबें आ जाती है
तो सूरज जल उठता है
और धरती पीली हो जाती है

तब कुर्सियाँ आसमान से टंग़ी
हवा में ईंधन छोडती नजर आती है
फूँकते हुये गरीबी
उसपर बैठी
दो जोडी गिद्ध की आंखे नजर आती है
कुछ तो गडबड है !!

सांसों के इर्द गिर्द घुमती जिंदगी

जिन्दगी कई तरह से
धुमती रही चबुतरे पर
रखे सांसों के इर्द-गिर्द
पनाह चाहिये उसे
तेरी तीखी तल्ख
शिकायतों से बचने के लिये

चलता उगता बढता वक्त
कभी भी नही रुका 
छिले जख्म सुखे नही कभी
नम सांसो से
जिंदगी पिघलती रही

शिकायते तेरी जायज़ रही
पहचान तो मुक्कमल हुई
करीब आते गये और 
दो गज जमीन नसीब ना हुई
रुह को

जिंदगी अपने लिबास में
खाक छानती रही
दरख्त की
दर्द को नंगे हाथो में लिये
फिरती रही वो

यह सच है कि
अभी एक ख्याल बाकि है
तू मिल तो सही !!