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तब माँ बहुत याद आती है

चाँदनी के वीराने में
दर्द के सिरहाने पर
जब कोई तितली उडती है
और कंधो के आस पास मंडराती है
तब माँ बहुत याद आती है

उडती है खुश खुश
बेहिसाब गमों के बीच
एक तितली
फड़फड़ाती पंखो से जब कही कुछ बोल जाती है 
तब माँ बहुत याद आती है

वह बैठती है
पलकों पर सुबह सबेरे 
अश्को की नमी मे
मायूसी के मौसम में 
जब पंखो से रंग उसके झर जाते है
तब माँ बहुत याद आती है

पूजा की थाली में
माली के फूलों की खुशबू पर
जब कोई तितली मंडराती है 
तब माँ बहुत याद आती है
 
फूल की कशिश और  
खुशबूओं की चाहत में       
बेटियों के स्पर्श से जब
कोई तितली रंग बिरंगी हो जाती है 
तब माँ बहुत याद आती है
 
सपनों के रंगो से
दिन-रात की चादर पर
जब कोई तितली नया रंग भर जाती  है
तब माँ बहुत याद आती है

प्यार की धून पर
तितली के थिरकन से
मन फूल सा खिल जाता है
और तब वह
दूर दूर तक जाकर लौट आती है
तब माँ बहुत याद आती है !!
 

सांसों के इर्द गिर्द घुमती जिंदगी

जिन्दगी कई तरह से
धुमती रही चबुतरे पर
रखे सांसों के इर्द-गिर्द
पनाह चाहिये उसे
तेरी तीखी तल्ख
शिकायतों से बचने के लिये

चलता उगता बढता वक्त
कभी भी नही रुका 
छिले जख्म सुखे नही कभी
नम सांसो से
जिंदगी पिघलती रही

शिकायते तेरी जायज़ रही
पहचान तो मुक्कमल हुई
करीब आते गये और 
दो गज जमीन नसीब ना हुई
रुह को

जिंदगी अपने लिबास में
खाक छानती रही
दरख्त की
दर्द को नंगे हाथो में लिये
फिरती रही वो

यह सच है कि
अभी एक ख्याल बाकि है
तू मिल तो सही !!