चाहत जब शून्य से भर जाये

शून्य के आगे
और पीछे भी तो है कुछ
पर तू जहां है
वहाँ ना भरना बाकी है
और ना खाली होना

जब भी वह अपने
जगह पर थोड़ा खाली होती है
तब जलती है
कविताये शब्द शब्द 

जब वह भर जाना चाहती है
तो पिघल जाते है समस्त हिमखंड
और डूब जाते हैं महादेश  

पर इक ज़रा तेरे हो जाने में
क्या कुछ नहीं उगता
सूनी धरती के माथे पर

ओंस की नमी की तरह  
फैला हुआ है प्यासी जमीन पर !!

वे बेच रहे है आँख और पहाड़

कौन सा राष्ट्र
धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जो 
धर्मो के बाजार की राजनीतिकरण है  
किस अनुशासन की बात करते है वे लोग
जहां ताख पर रखे नियम क़ानून को
तब उतारा जाता है
जब कोई गिद्ध या चील जाल में फंसते है 
  
चिंट्टियो के बिल में
झोंक देते है वे सारी उम्मीदें
जहां सिर्फ अन्धेरा है और कीड़े
उनके बीच अपनी मूंह खोलने वालो को
अपनी औकात खानी पड़ती है बेबसी में 

सुबह का सूरज देखने के लिए
उन्हें देखना होता है उनके शीशे में
और धुप को
अपने पूर्वजो की पूंजी बताते है वे
और बड़ी ही सहजता से निगल जाते है चाँद
कर देते है तारों की पूरी जमात को
अंधेरी रात के हवाले
चांदनी को लूटते है व्यवस्थापिका के नाम पर

साहब लानत है
जहां आम को आरी से काटा जाता है और
और कटहल चौराहें पर बड़ी ही ऊँची आवाज़ में
अपने काबलियत का परचन लहराता है
लाठी और सिक्को के जमीन पर 
मोटी चमड़ी होने के बावजूद
वह राष्ट्र को संबोधित करता है

अँधेरे में औरतें बच्चो को सुलाती है
कौन से कौम से आये है लूटेरे
जिनके चश्में में झांकना मुश्किल
माँये धरती हुई जाती है
बंजर
उसपर वे तेज़ाब का कुआँ खोदते है

बेच रहे हैं आँख और पहाड़
लूटकर मासूमियत
किसे देश कहे और किसे देश भक्त
क्या हम अपने बच्चो के उनकी अपनी आँख लौटा पायेंगे !




प्यासी चिडियां

उन शब्दों का क्या
जो कभी पेड़ या तने हुआ करते थे

वक्त ऐसा है कि
शब्द पत्थराने लगे है
शीतल छाँव के आभाव में
धरती सूखती जा रही है

आसमान बेबस है
निहारता है अब
धुप और छांव

क्षितिज के छोर पर
बैठी प्यासी चिडियां
सूखती नदी को पुकार रही है
वह कौन सा शब्द होगा
जिससे गंगा वापस आयेगी  !!

सामंती दीवारों के बीच

शहर का बाप नहीं होता
इनके फ़रिश्ते क़ानून तोड़ते है
कुतर दिये गए पंखो में
गौरैयां
उड़ने की कोशिश में फडफडाती हैं 
  
मांये दीवारों में चून्न दी गयी है
बावजूद इसके
वे फरिश्तो को दीवार फांदना सिखाती है
और गौरैयो को फडफड़ाना

सामंती दीवारों में
सिर्फ
धंसता है वक्त
फ़रिश्ते सपनें देखते हैं 
और गौरैयाँ आसमान तलाशती है !

सूखती रही कई कई नदियां

जीवन पी जाती है
कई कई नदियां
और मछलियां तड़पती हुई
दम तोड देती हैं

लहरों ने बचाई
कई कई बार
कई कई जिन्दगियां
बावजूद इसके
सिकुड़ती गई गंगा

उछल कर
गिरती रही मछलियां
और सूख गई सब नदियां !!

सरकार अब भी, क्या सोयी रहेगी ?

एक चिड़ियाँ आती है
और मुंडेर पर तकती सूनी आंखों को
सरकार की भाषा समझाती है

आंखें गंगा की तरह सूख जाने वाली है
सोयी हुई है सरकार
कब जगेगी
नगे धड़ो के लिये क्या?
सरकार अपने मुँह पर कालिख पोतेगी
या सिर के बदले सिर लायेगी

चेहरे की झुर्रियो में दर्द से कराहती
बची सांसो की चीत्कार छुपी है
क्या न्याय ?
अब भी आंख पर
पट्टी बांधकर सोयेगी!!

स्पर्श ...

एक दीप जलायें
चल तिमिर के पार चलें

वहाँ जन्में
जहाँ कभी हम
अस्तित्व में थे ही नही

स्पर्श
शब्दों का
खिलाकर करे
वो जमीन पैदा
जहाँ खुशबू ही खुशबू हो !