शून्य के आगे
और पीछे भी तो है कुछ
पर तू जहां है
वहाँ ना भरना बाकी है
और ना खाली होना
जब भी वह अपने
जगह पर थोड़ा खाली होती है
तब जलती है
कविताये शब्द शब्द
जब वह भर जाना चाहती है
तो पिघल जाते है समस्त हिमखंड
और डूब जाते हैं महादेश
पर इक ज़रा तेरे हो जाने में
क्या कुछ नहीं उगता
सूनी धरती के माथे पर
ओंस की नमी की तरह
फैला हुआ है प्यासी जमीन पर !!
और पीछे भी तो है कुछ
पर तू जहां है
वहाँ ना भरना बाकी है
और ना खाली होना
जब भी वह अपने
जगह पर थोड़ा खाली होती है
तब जलती है
कविताये शब्द शब्द
जब वह भर जाना चाहती है
तो पिघल जाते है समस्त हिमखंड
और डूब जाते हैं महादेश
पर इक ज़रा तेरे हो जाने में
क्या कुछ नहीं उगता
सूनी धरती के माथे पर
ओंस की नमी की तरह
फैला हुआ है प्यासी जमीन पर !!