Showing posts with label आदर्श. Show all posts
Showing posts with label आदर्श. Show all posts

जिस्म जो पिघल जाता है शीशे में

सच्चाई से परहेज क्यों है
समाजिक आडम्बर जब
शीशे से छनकर बाहर आती है
और आंख दिखाती भी है
तब हम जेहादी हो
मारते खुद को है
समाजिक तिलिस्म पर

हाथी भी मौन में
कई मन एक दिन में खाता है खुराक
ठीक ऐसे ही हम चबाते है
सुबह से शाम तिलिस्म आदर्शो की 
ठीक सोने से पहले तक

मुखौटो पर रंग सबसे ज्यादा
काला ही लगा होता है
फिर फिर पहनते है
और लौटते हो
मानो लौट जायेंगे
सात समंदर
और जिस्म भी बदल देंगे
जैसे बारिश के बाद धूप
इंद्रधनुषी हो 
बदल देता है आसमानी चेहरा

कई हिस्सो से जिस्म कटता
मोम सा विचार भी
खाता रहा हैं जलकर सीने को
पैदा होने से लेकर अंत आने तक
चेहरे कितने तेजी से बदल लेते है
रुप और साज-सज्जा बखुबी
यह  कोई मानविय चाल है

नाटक के प्रथम चरण और अंतिम चरण
शुन्य में दिखता है
मध्यांतर के पहले और उसके बाद
पहले सिखी बातो को
झुठलाता है और आडम्बर में जीते हुये
दोहराव को ओढता है
कुढते हुये शून्य में
सहज पलायन करता है अंत में

दरअसल
पलायन जिस्म का नियम है
पर समाजिक तिलिस्म
मानविय?????