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तिलिस्म को करीब देख

गमों से पार हो
कश्ती
जला के दीप
करीब देख

अंधेरा हो घना
तो सुबह के साथ
सूरज को 
करीब देख

मचलते अरमान को 
गर गले लगाया तूने
तो दरिया को
करीब देख

हो सके तो लौट जा
आशियाने में
वरना आग को
करीब देख

जमीन और आसमान
मिलेंगे जरुर पर
उससे पहले
समंदर को
करीब देख

तेरी लेखनी में
वो दम है कि
छूते हुये आसमान को
करीब देख

वो है रहन्नुमा
कि तू बेफिक्र हो
साहिल को
करीब देख

माना मैंने आज की
शब्द है जादू तेरे
पर नादान दिल
तिलिस्म को
करीब देख !!

जिस्म जो पिघल जाता है शीशे में

सच्चाई से परहेज क्यों है
समाजिक आडम्बर जब
शीशे से छनकर बाहर आती है
और आंख दिखाती भी है
तब हम जेहादी हो
मारते खुद को है
समाजिक तिलिस्म पर

हाथी भी मौन में
कई मन एक दिन में खाता है खुराक
ठीक ऐसे ही हम चबाते है
सुबह से शाम तिलिस्म आदर्शो की 
ठीक सोने से पहले तक

मुखौटो पर रंग सबसे ज्यादा
काला ही लगा होता है
फिर फिर पहनते है
और लौटते हो
मानो लौट जायेंगे
सात समंदर
और जिस्म भी बदल देंगे
जैसे बारिश के बाद धूप
इंद्रधनुषी हो 
बदल देता है आसमानी चेहरा

कई हिस्सो से जिस्म कटता
मोम सा विचार भी
खाता रहा हैं जलकर सीने को
पैदा होने से लेकर अंत आने तक
चेहरे कितने तेजी से बदल लेते है
रुप और साज-सज्जा बखुबी
यह  कोई मानविय चाल है

नाटक के प्रथम चरण और अंतिम चरण
शुन्य में दिखता है
मध्यांतर के पहले और उसके बाद
पहले सिखी बातो को
झुठलाता है और आडम्बर में जीते हुये
दोहराव को ओढता है
कुढते हुये शून्य में
सहज पलायन करता है अंत में

दरअसल
पलायन जिस्म का नियम है
पर समाजिक तिलिस्म
मानविय?????