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तू जिस्म नही रूह है

तू रूह है
तस्वुर की खाक
तो जिस्म है

पौ फटने के वक्त
सूरज का आसमान  पर
उगने से पहले
पंक्षियों के कलरव के बीच 
तेरा हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

चाँद का चाँदनी से
मिलने के ठीक
पहले के वक्त में
सितारों के बीच 
तेरा हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

खुब खुब भींगना
मेध के बरसने के ठीक
पहले के वक्त में
बादलों से झांकना
तेरा हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

आग लगने से
पहले की चिंगारी तू
और खाक होने से पहले
तेरा बस हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

तुफान के उठने से
ठीक पहले के वक्त में
हल्की और मधूर ब्यार से
सिहरन का पैदा होना
और तबाह होने के पहले
बस तेरा हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

डुबने से पहले
उठते भँवर में
चक्कर खाने के बीच
बस तेरा हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

जिस्म जो पिघल जाता है शीशे में

सच्चाई से परहेज क्यों है
समाजिक आडम्बर जब
शीशे से छनकर बाहर आती है
और आंख दिखाती भी है
तब हम जेहादी हो
मारते खुद को है
समाजिक तिलिस्म पर

हाथी भी मौन में
कई मन एक दिन में खाता है खुराक
ठीक ऐसे ही हम चबाते है
सुबह से शाम तिलिस्म आदर्शो की 
ठीक सोने से पहले तक

मुखौटो पर रंग सबसे ज्यादा
काला ही लगा होता है
फिर फिर पहनते है
और लौटते हो
मानो लौट जायेंगे
सात समंदर
और जिस्म भी बदल देंगे
जैसे बारिश के बाद धूप
इंद्रधनुषी हो 
बदल देता है आसमानी चेहरा

कई हिस्सो से जिस्म कटता
मोम सा विचार भी
खाता रहा हैं जलकर सीने को
पैदा होने से लेकर अंत आने तक
चेहरे कितने तेजी से बदल लेते है
रुप और साज-सज्जा बखुबी
यह  कोई मानविय चाल है

नाटक के प्रथम चरण और अंतिम चरण
शुन्य में दिखता है
मध्यांतर के पहले और उसके बाद
पहले सिखी बातो को
झुठलाता है और आडम्बर में जीते हुये
दोहराव को ओढता है
कुढते हुये शून्य में
सहज पलायन करता है अंत में

दरअसल
पलायन जिस्म का नियम है
पर समाजिक तिलिस्म
मानविय?????