आज नही तो कल तुम्हारी बारी है

नरम सुकोमल पंखों को
विस्फोट से
वे उड़ाते रहे उन्हें

धरती की नरम घासें
सूख कर पीली होती रहीं
कुर्सियों  की भार से

बंदूक से छलनी करते थे वे
और रुपयों को उछाल कर
पत्थर तोड़ेते थे  

गौरैयाँ दबोच ली जाती थी और
मासूम बलि चढ़ते थे
और माँ मिट्टी की घर थी

पर जिस दिन
निर्दोष लोगों की भूख
उछल कर महलों तक आयेंगी
उस दिन मत पुछना कि
गलती क्या थी हमारी

उनसे बचकर रहना
अय तंत्र
जिन्हें तुम नेस्तनाबूद किये जाते हो !

एक कीड़ा रेंगता है पूरे कैनवास पर

नन्हें आंखों को
कई चश्मे मिले
सांसो की सफर में

चश्में चढे‌ आंखों की
तह में
एक कीड़ा रेंगता है
भय के पर्दे के बाहर
नही आता ,पर
अक्सर रात के सन्नाटो में

आँखो के धुंधला जाने पर मातम मनाता है

रौशनी की चाहत में
रौशन दीये की तरह जलता भी है
एक कीड़ा
बेहद घनी जिंदगी के बीच
कुछ जाले बुनता है
नर्म और गुनगुना !

चाँद तारे तोड़ लूं

तू ज़रा करीब आ
तो पुछ लूं
कि उनका सूरज दूर क्यों है ?

चिराग़ सिर्फ
बंद दीवारो के बीच
सकून तौलते है
आ ज़रा करीब तो
चाँद तारे तोड़ लूं

उन्हें भी मय्यसर हो
उजाले 
फेर जरा हाथ तो 
वो नज़ारे जोड़ दूं !!

बाज़ार की नज़र में

आसमान के नीचे की दुनिया सिमट गई थी
छ्तो की चौड़ाई बढती रही 
और परिंदों के परों पर उड़ान भारी था

पत्थरों से टकराते रहे
सम्वेदी तंतुयें 
प्यास बढ़ती रही और
पंख झड़ते रहे

बाजार की नजर में
दुनिया बिल्कुल गोल थी
और आदम जात एक वस्तु !!

तेरे शहर में

फख़्त
दो चार दिन की चाँदनी थी
और वक्त कातिल
शहर में हरशख़्स
यूँ ही तन्हा न था

एतवार अपने अक्स पर
क्यों ना करते
पर आइना शहर का
पुराना बहुत था

तेरा शहर मशहूर बहुत था
आते रहे हररोज़
तितलियों की चाहत में 
पर पहचान बदलकर  !!

दहलीजें उनकी जला दी गई थी

खास लोग थे जिन्हें
लोहे की फैक्टरी खोलना था
गरीबी की सारे मोम पिघल गये थे
और उनकी दहलीजें जला दी गई थी

जंगल में सूखी लकडियों की बाढ़ आ गई थी
और उनके रैन-बसेरों को जलाया जा रहा था
जो जीवन को जीना जानते थे
घातक नही उर्वरक थे
समाज की सुक्ष्म इकाई

और इंसानियत के आधार भी

वर्दीधारी बंदूकवाले
उनके पीछे छोडे गये थे
ताकि जंगल को मिटाया जा सके
और पत्थरों को उगाया !

और अब कैद में है

वर्षों तक एक ही शब्द के जिस्म में पनाह ले रखी थी
और बाहर महंगाई काट रही थी अक्षरों को
पन्नों पर स्याही बिखरने लगा था और हम थे कि
शुतुर्मुग की तरह 
तुफान न होने की सम्भावाना को बनाये रखने के लिये
सिर छुपाये बैठे थे

कहर कुछ इसतरह बरपा था कि
सम्वेदनायें शाखो से कट कटकर गिर गई थी और
हम ठूंठ पेड़ को
समझ बैठे थे अपना घर
पन्नों के हिस्से में थी प्यास जो खाली था 
उसे पढने के लिये ज्ञान की नही
बल्कि दिल की जरुरत थी 

वह घर जो सफ़र में छूट गया था अकेला
अब वह किताबों से भरा पड़ा है
और हम भटक रहें शब्दों के भीड़ में
उसका मिलना
किताबो के बीच सूखें फूल की खुशबूओ की तरह है 
जिसे ना कोई किताब
ना वक्त ही कैद कर पाया
वह उड़ता रहा हम भटकते रहे
और अब कैद में हैं
सजे-सँवरे किताबों के बीच !!