लौटना चाहते है तो घर

जाना किसी लौटने से कम ना हो
पर इस वक्त मे
सडके भी गुत्थियों से होकर जाती हैं 
और गुत्थियां कंदराओ मे ठहरा हुआ,घुप अंधेरा हैं

रौशनी, सूरज से जितना दूर
और ठहरा हुआ
कदम भी उतना ही घर से दूर
फ़िर भी हम लौटना चाहते है, तो घर
काश बचपनवाला घर लौटता
जहां सब कुछ सुन्दर ही होता था

सच 
सुन्दरता को बचाना कितना मुश्किल है
जैसे कविताओं मे
भाव से, शब्दो को कटने से बचाना 
अभी इस कटते वक्त मे
सिर्फ़ लौटना चाहते है तो घर

मां-पिता जी के संतोष से भरे 
नजरोंवाले घर मे
सुन्दरता को बचा लिये जाने वाले 
उस घर मे
जहां एक ही पल मे जमीन और आसमान
बडी आसानी से मिलता हुआ दिखाई दे जाते थे 

आज अगर
लौटना चाहते है तो 
सिर्फ़ घर !

धडकन

हमारे मसीहा हमे भूलाते गये 
और हम मानो किसी नदी से बाहर आते गये
ठहर गई जिन्दगी वहां
जहां मरुस्थल सी ताप थी

सडक किसी विराने मे
अकेले कही किसी ओर चलती गई
बची हुई मुठ्ठी भर सपनीले रातों को
अब दरिया के किनारे रखूं या सूरज के सामने

हकीकत यह रहा कि
रौशनी और अन्धेरे के बीच
उलझती गई जिन्दगी यूं
कि साफ़ आइना भी धुंधलाने लगा

बचा सकते हो तो
पाषाण मे जीवित धडकनो को बचाओ
ना कोई यहां मसीहा है
और ना ही कोई तख्तोताज़
ना ही कोई हाथ है
और ना ही कोई द्वार
जो हमारे मुक्ति के दिन के साथी बने !

गर अंधेरे मे कोई नाच ना होती

दांत तले जुबान ना दबती 
असल में
एहसास खुबसूरत होती तो
फ़ूल नाजुक है
वे कभी ना मुरझाते, साहब
ना यहां कोई जमीर बिकता
और ना ही अंधेरें मे कोई नाच होती

हकिकत तो यह है कि
यहां रोज पिटारे से
रंग-बिरंगे फ़नोवाले
सांप निकलते है

इनकी जुगलबंदी से
धरती छलनी होती है
और आसमान तौला जाता है
हवा में
विष की उमस इतनी की
बादल सूख जाता है और
जमीन बंजर होती चली जाती है

पेड़ काटे गये असीमित
छांव कोई कल्पना है, अब 
जो सपनें मे भी नही मिलती है !

सरकार की सल्तनत में

आरजूओं को
रात में ढल जाने दो
सुबह की इन्तजार में
ताकि
कुछ शब्द जलते रहे
और कुछ शब्द बाकी रहे !

चमन हो और
ख्वाब भी हकीकत हो
यह मुमकीन नही
रात की विरानगी में
जुगनूओ का डेरा रहे
ताकि
चांद कुछ बाकी रहे !

ऐसी उम्मीद कि
लाठी मिले
मुफ़लिसी को
ताकि
उनकी आंख खुलती रहे
और सरकार की सल्तनत में
अल्पसंख्यकों की नींद सलामत रहे !

उन दीवारों पर

भीड़ बहुत है
सबने अपना अपना सामान बाँध लिया हैं
और जो छूट रहें है
उनका पता कही खो जायेगा गुमराह राहों के बीच


बहुत दूर जाना है
कही दूर मंजिल भी है
पर रास्तों का
कही कोई अपना ठिकाना भी तो नहीं है
वजह कुछ ऐसी है कि
सघन हताशा और निराशा के बीच सबको सफ़र करना है

घर के अन्दर कई दीवारे हैं
और उन दीवारों पर
तस्वीरें टिकती भी तो नहीं !

तेरे महफ़िल में

त्रिकोण है कोई
धटनाओ के अंतराल के बीच
एक कोने का ओरछोर मिले
और दूसरे कोने को समझ पाते
इससे पहले
तीसरे कोने पर कोई दर्द
टंगा मिलता


मजबूरी यह थी कि
एक कोने से दूसरे कोने तक
हम सीधे सीधे ही जा सकते थे
चलने की चाल चाहे जो भी अख्तियार करते
पर सीधे सीधे चलकर ही
दूसरे कोने तक पहुँचना संभव था

तीसरे कोने तक पहुँचने पर
वक्त हमें माफ़ नहीं करता था
और इसतरह
हम धरासायी होते रहे
तेरे महफ़िल में
और तूने आवाज़ तक ना सुनी !

सुनहरे स्वपन में तू

बारिश नहीं बरसेगी
रातें नहीं तरसेंगी 
नींद अपने स्वपन में उतरेगी

उम्मीद
किसी डाल की चिड़ियाँ नहीं
जो फुर्र से उड़ जाए
एक पल या दो पल बैठकर

रोकना है तो रोक लो
अनंत असंख्य जघन्य
नुकीले कीलों को गड़ने से

दीवारों में कैद साँसें
अब बगावती है
टूट जायेंगी दीवारे
एक अदद खिड़की के लिए

मंजिल
अपना रास्ता
आखिर तलाश ही लेती है !