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मुश्किल बस इतना सा

मुश्किलों से खेलता 
रोता बच्चों की तरह 
दिखता
उसके आंखो में खुदा 
मानो वह बचपन का
छूटा कोई ख्याल   

मुश्किल यह है कि
मुश्किल में सख्त नही वह 
पर उम्र और समय से परे 
बहुत आसान 
क्योंकि बुध्दिजीवी है
वह जी लेता हैं सबकुछ 
पता है उसे
चाहता क्या है

चाहत उसकी
बंद मुठ्ठियों में खुला आसमान 
जिसपर खींच रखी है उसने
चंद लकीरें ख्वाहिशों की 
इंद्रधनुषी
सूरज मद्धम नही होता उन रंगों की

मुश्किल बस इतना सा कि
ख्वाब उसका अपना सा है
जो सोने नही देता !!  

कैनवास पर फैला आसमान

छाँव में बैठी
एक नन्ही सी जान 
छू लेना चहती है
कैंनवास पर फैले
लम्बे चौडें आसमान को

ब्रुश से बिखेरते हुये 
कुछ जमीनी रंगों को  
और समेटना चाँद-तारो को
नन्हें हाथो से

जिद्द को गले से लगाये बैठी है कि 
पूरा आसमान चाहिये     
या उस तक पहुंच जाने की
एक उडान बस
गहरे और हल्के पेंसिल से
बनाती हुई कई शेड्स
चमकते सूरज का

रंगना चाहती है
उन तितलियों को भी
जिन्हें नही मिला है रंग
कुदरत से
और वे दिन के उजाले में नही उडती

उडना भी 
पंक्षियो के बीच उन्मुक्त हो
गहरे आसमान की गहराई में 
माप लेना
जमीन और आसमान के बीच की
खालीपन को चंद रंगों से

उतारना कुछ रंग आसमान से भी
जो जमीन से गायब है अब
उन चेहरों को सजाना भी
जिन्हे बचपन ने बेरंग कर दिया था  !!

तलाश रास्तों की अभी बाकी हैं

वह उस जंगल में है अभी तक
जहाँ अवतरण होता है हर किसी का
सांसों के गिनती के साथ
लोग बने रास्तो पर निकल जाते है

खोज रही है सांसों का विकास
वो रास्ता
जो बना बनाया ना हो
क्योंकि नयी और पुरानी जमीनों के बीच
कुछ लोग भटक चुके हैं

वह बनाना चाहती है
पूर्वजों के जमीन पर
एक नया रास्ता
जो थोप कर नहीं बनाई गई हो
जिसपर चलना बनावा और छलावा ना हो

जिस रास्तें का चेहरा मुस्कुरायें
जिसपर आदमियत चलती हो
नाक पर जीने वाली दुनिया
सिर्फ भेंद पैदा करना जानती हैं
जहां दिल रोता है अरमान बिलखते हैं

मेरे और तुम्हारे बीच की जमीन
जिसका रंग भी एक जैसा हैं ना
उन्हें तलाश है  आज भी
उन रास्तो की !!!

रौशनी दुविधा में है

रास्ते भी ना
कितना अकेला होते है 
मुसाफिर तो मंजिल को निकल जाते है
कोई भी किसी भी
रास्ते के लिये नही रुकता 
ठहरे हुये रास्ते   
खडे रहते है श्रमशील 
हम जैसो को आगे बढाने के लिये
पर उनका भी एक दर्द है
और वे इंतजार में है दरअसल
मंजिल कब ठहरेगा उनके वास्ते 

रेगिस्तान के फैलाव और तपिश में  
उसकी नजर जवान हुई थी
और इसतरह इश्क के मृग-मिरीचिका में 
रेगिस्तानी कैक्टस से दो-चार होती रही
कांटो की चुभन में रात सांस लेती 
अश्क सूरज की प्यास बुझाता
दरिया अरमान के बहते हुये
सुखते रहे थे

जब तुम्हारी उंगलियो ने
आसमान से झरते नीले सपने को
स्पर्श का जामा पहनाया था
और उसी वक्त 
समंदर के छिछले तल में उसे
छोड दिया था तन्हा 
तब भी वह ढुँढती रही मोतियाँ
तुम्हारे उंगलियो के वास्ते 

बहुत दूर निकल गई थी
घुटनो के बल अकेले ही
उसके कंधो पर नन्ही कोंपले तो थी
पर पेड की छाँव दूर दूर तक नही
आज भी उसे छाँव
एक छलावा लगता है
और भटकावमात्र प्यास का

असमान में पक्षियो के झुंड को
उडते देखती और
घंटो सोचती, खुशकिस्मत है ये कि
साथ साथ लौटते है घरौंदो को
इनकी जुबान नही होती पर इक्कठा रहते है
और कितना कुछ पहचानते है
आंखो से एक-दूसरे को
कितना अच्छा होता कि इंसानी तहजीब में
यह बात शुमार होती

जिंदगी जितना भरती
उससे कई गुन्ना अधिक खाली हो जाती
लोगो को कहते अक्सर सुना था कि
खाली हाथ है हम 
जिसे वे भरना चाहते थे   
भूख उन सभी लोगो को भी थी
जिनका घर सोने का था

घुप अंधेरा
जहाँ के हम सब वाशिंदे थे 
पर अपने बच्चो को नही दिखाना चाहते थे
रोना जिंदगी का
हर हाल में
क्योंकि वे  जानते थे कि 
कि रौशनी में
उजला रंग कम काला ज्यादा है
जो जीवन को प्रज्जवलित करता है

रौशनी दुविधा में है
सच्चाई से परहेज क्यो है आंखो को ??