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मुश्किल बस इतना सा

मुश्किलों से खेलता 
रोता बच्चों की तरह 
दिखता
उसके आंखो में खुदा 
मानो वह बचपन का
छूटा कोई ख्याल   

मुश्किल यह है कि
मुश्किल में सख्त नही वह 
पर उम्र और समय से परे 
बहुत आसान 
क्योंकि बुध्दिजीवी है
वह जी लेता हैं सबकुछ 
पता है उसे
चाहता क्या है

चाहत उसकी
बंद मुठ्ठियों में खुला आसमान 
जिसपर खींच रखी है उसने
चंद लकीरें ख्वाहिशों की 
इंद्रधनुषी
सूरज मद्धम नही होता उन रंगों की

मुश्किल बस इतना सा कि
ख्वाब उसका अपना सा है
जो सोने नही देता !!  

मिठ्ठे मासूम मुस्कानों के पीछे से

बच्चों के पैरो में बेबसी के
कोयले पोते जाते रहे
दूसरे किनारें पर लटकता सूरज 
सुबह सुबह भूख उगाता रहा 
पीने के लिये कीटनाशक मिलते
इतनी सडकें सख्त की चलना उसपर
मुश्किल तरीका बनता गया

भूले भटके लोंगो की तदाद इतनी
कि भीड में
आंखे अपनी पैर तलाशती
रातें ग़ीली होती थी और सपनें
घरो में टंगे सूखते मिलते
हाँथ कोसो दूर बंजर जमीन कोडती
और पेट भर भूख निकलता 

गरजते बादल उमड घुमड के
कही और बरसते रहे
बिजलियाँ उनके कलेजे पर गिरती रही
दीवारें प्यासी ही ढहती गयी
मायूसियों में खामोशी की नुकीली दांत
नोंचते हुये गरीबी को आंख दिखाती रही 

रौशनदान से एक गौरैया रोज आती
और एक तिनके से
घर को घर बनाती
आज महीनों बाद भी वह डूबा मिला
और शाम की तरह
मायूसी की चादर लपेटे हुये खामोश रहा  

फूल जैसे सबसे सुंदर बच्चे कोयले की खादानों के
अंतर तल पर उसके इंतजार में 
एक मूँठी प्यार लिये उसे पुकारते रहे
सबसे मिठ्ठी मासूम मुस्कानों के पीछे से
जरूर आयेगा वह
उनकी कविता लौटाने  !!

वह नदी रही पर सूखी रही

यादो के निर्मल झरनें में बहती रही
जाने किस किस लम्हो में
वह नदी रही पर सूखी रही

बहती रही उफनती रही
कलकल  हुई छल छल बनी
वह नदी रही पर सूखी रही

सुनहरी हुई सौंधी बही
सूरज डुबा मद्धम शाम हुई
वह नदी रही पर सूखी रही

गुजरती रही हरीभरी हुई
शांत लहरे तन्हा रातें रेंत हुई
वह नदी रही पर सूखी रही

गाती चली सुमधुर बही शीतल हुई
लहर लहर मचल मचल
वह नदी रही पर सूखी रही !!

तू जिस्म नही रूह है

तू रूह है
तस्वुर की खाक
तो जिस्म है

पौ फटने के वक्त
सूरज का आसमान  पर
उगने से पहले
पंक्षियों के कलरव के बीच 
तेरा हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

चाँद का चाँदनी से
मिलने के ठीक
पहले के वक्त में
सितारों के बीच 
तेरा हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

खुब खुब भींगना
मेध के बरसने के ठीक
पहले के वक्त में
बादलों से झांकना
तेरा हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

आग लगने से
पहले की चिंगारी तू
और खाक होने से पहले
तेरा बस हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

तुफान के उठने से
ठीक पहले के वक्त में
हल्की और मधूर ब्यार से
सिहरन का पैदा होना
और तबाह होने के पहले
बस तेरा हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

डुबने से पहले
उठते भँवर में
चक्कर खाने के बीच
बस तेरा हो जाना
तू जिस्म नही रूह है

दर्द की आंख नही होती

देखती हूँ उसे  
गुजरते वक्त की तरह

वही जिसने अपने सारे अश्क
मेरे हथेलियों पर रख
और डूबी हुई सूरज के मानिंद
समंदर में गोते लगा रही थी
प्रश्नों के भँवरजाल के बीच 

उसकी उम्र शायद
उतनी है
जितनी की एक माँ की होती थी
बरस रही थी मेघ की तरह
पर अस्तित्व उसकी प्यासी थी

फूँकार रही थी सवालों के बीच
दूसरे ही पल 
कसी हुई जंजीरों में फडफडा भी
पंखों के टूटने से घायल भी थी
समाज और उसके बीच की खाई में
गिरने से तिलमिला गई थी

समाजिक होना भी 
खाक होने जैसा था
जिसमें कही कोई चिंगारी नही होती  
एक बहते हुयें  शांत सोते की तरह होना था 

अप्रत्यक्ष दर्द जो उसके पलू में बंधे चलती थी 
वह उसके आग में जल रही थी
गांठों से मुक्त हो
समताप में जीना चाहती थी

समय को दुहाई और
माँ-बाप की मजबूरी
बेटी परायी जात
एक रस्म है
यह उन्होनें नें बना रखा था 
जिन्होनें उसे साडी में लपेटकर
खुद को बंधन से मुक्त कर लिया था  !!

एक तितली

चलते हुए सपनें में
एक तितली
भरती रंग पंखो पर

हरा नीला पीला सब
इंद्रधनुषी
आसमान छूने की चाहत में
चलती बादलों पर
भींगती बारिशो में

और फिर
बहती सात सूरों में
सुरीली  हो 
मिल जाती समंदर से 
किनारो से टकराती
छूती लहरों को

सभी मौसमों में
रंग भरती 
थकती नहीं
चलती जाती
उडती डाल डाल और
पात पात
हर सफर हर राह

आसमान ऊँचा सही   
पर रंगीन परो पर
चाँद सूरज बिठा
छू लेती गगन 
एक तितली चलते हुए
सपनें में !!


कैद है धड़कन

लोगों का कहना था कि
आज चाँद पर उथल-पुथल है
इसतरह मेरी जमींन की चाँदनी धुंधलाने लगी 
और धडकनें भी
तुम्हारे मुठ्ठियों में बंद पडी रही

रात स्याह कुछ ज्यादा थी
वह खडी रही मेरी जमीन पर
भोर के इंतजार में
पर सूरज थोडा कम था
सुबह आंख मुदे पडा रहा
तुम्हारे किनारे से लग

ना तुमने मुठ्ठियाँ खोली 
ना भोर ने आंखे  
न रात को नींद आयी
और धडकनें भी बंद रही
तुम्हारी मुठ्ठियों में  कही !!