आँखों में कैद पता

तेरे शहर से
रिश्ता बहुत पुराना था
कारवां बढ़ता गया राहें मिलती रहीं 
पर आँखों में कैद
पता
सिर्फ तेरे शहर का रहा

तेरी जमीन से
जुडी हुई यादें बहुत रुलाती रही 
रुत बहारों की कई
आती और जाती रहीं 

उड़ता रहा वक्त
पाखी बन ,
पर उसका रंगता गया
आसमान की तरह

आगोश में उसके
सितारे बहुत थे
पर चाँदनी
चाँद के इंतज़ार में रही 

आज मुद्दतो बाद
मिलना हुआ उनका 
पर मिले भी तो 
जमीन और आसमान की तरह !

शब्द पन्नों के बीच सुबकते है

पन्ना पलट दो
अब
अक्षर बिखर जायेंगें
शब्द बचा लो
वरना
आसमान टुकड़ों में
बिखर जायेगा

सब्र उनका टूट चुका है
पहाड़ आज बिखरने लगे है
जो युगों रहे 
अडिग और अटल

मासूमियत
उन किताबो की तो देखो
जिन्हें वे पढ़ते हुये
बड़ी बेरहमी से पलटते रहे

वक्त सख्त रहा
किताब के उस हिस्से को तो पढो
जो अब तक मौन था
फट जाये
उससे पहले
इसे बचा लो !!


चल और अचल लम्हों के बीच जिन्दगी कुछ ऐसी है

दो-चार कदम पर था फूल-चमन 
दो-चार कदम पर वह भी थी
जीवन ठहरा, एक समंदर
दरिया की कहानी थी

दो-चार कदम पर थे चाँद-चांदनी
दो-चार कदम पर ही जुगनू थे
रौशन सूरज, फिर भी तन्हा
सितारों की कहानी थी

दो-चार कदम पर थे मंदिर-मस्जिद
दो-चार कदम पर, वे भी थे
सबसे ऊपर एक नाम था
पर अन्धो की कहानी थी

दो-चार कदम पर था सुबह-सवेरा
दो-चार कदम पर ही अंधियारा था
जलता सूरज, सुन्दर बहुत था
भटकन की कहानी थी

दो-चार कदम पर थे लोग-बाग़    
दो-चार कदम पर ही जंगल था
हरियाली थी बहुत सुहानी
पर मिटने की कहानी थी !

पर समंदर कहाँ है ?

रात की गहराई में
एक पुराने जर्जर किले से
एक परिंदा कूदता है
अद्वैत में और तड़पता है
जमीन बहुत सख्त है
जिस्म को खुरदुरा कर देती है
धायल पंखो से वक्त काटता है

बंद कमरों के झरोखें
नहीं खुलती हैं आसानी से
जकड़न है सदियों पुरानी 
पहचाने चेहरों पर गर्द जमी हुई है
और आइना धुंधला गया है

तोड़ना चाहता है वह
उन दीवारों को 
जहां उसे दफनाया गया था

उम्मीद की लहरें चाँद तारो को छूती है
पर जमीन और
आसमान के बीच की शुन्यता में 
यह तय नहीं कर पाता कि
उड़ान कितना बाकी है और लौटना कहां है ?

चारदीवारी की बीच बैठा परिंदा
परात में सज्जी पडी कई जोड़ी आँखों को देखता है
और सभी आँखें उसे देखती है
डूबना चाहता है 
पर समंदर कहाँ है ? 

तलाश जारी थी

लगातार कई शब्द एक साथ
रात की चादर पर बिछती रही 
अंधेरों ने रौशनी को
जादुई एहसास में पिरो रखा था

सूरज पैसो की तरह खनकता हुआ निकलता 
और कुर्सियो के पैरो तले डूब जाता था
हालांकि घास धरती पर
भूख और जिन्दगी के बीच की जद्दोजहद में
हरा रंग बचा लेना चाहती थीं

लगातार भूस्खलन से
दरारें पड गई थी दीवारों में 
छतो से होकर रौशनी नहीं आती थी
गढ्ढे अपनी पुरानी शक्ल में
उम्मीदो पर पानी फेर देते थे

अँधेरा गहराने पर घर की तलाश में
सन्नाटें 
दरवाजो को खटखटाते थें
बड़ी उम्मीद से ,पर
हर बार शिकस्त होती रही साँसों की
सियासत से
और उम्मीद आग में जलती रही

आग का गोला और समन्दर दोनों
बड़े करीब दिखते थे बावजूद इसके 
तपिश जिन्दगी की कम ना होती थी
समंदर शांत था पर
लहरों की उछाल में संघर्ष जारी रहा  

सभी दिशाओं में कुछ गीने-चुने लोग 
मानव मन की कटोरी में बचे हुए थे
जो सूखते हुए उम्मीद पर
प्रेम की हथेलियों से नमी डाल रहे थे
ताकि पृथ्वी को
उसके सम्पूर्ण गोलाई में बचाया जा सके !! 

एक उम्मीद रही तलाश को

वे मगरूर हुये जाते है
कि
चाँद उनके मुठ्ठी में है

उन्हें नहीं पता कि
झील में कैद चाँद
चांदनी को तरसता है
चाहत की प्यास में
झील सूखता जाता है

उम्र सागर की
चाँद तक रही
पर
धरती पर चाँद
कब आता जाता है

उससे ना मिलना
एक बेबसी है
उनको अब ये बात
नागवार सी गुजरी है

उसकी एक तलाश में
भटकते रहे
दर-ब-दर
तलाश फिर भी तलाश रही

यकीन
कुछ यूं ना था कि
वह मिल जायेगा ऐसे
जिसकी प्यास में
पूरी जिन्दगी गुज़री !!

लहू के रंग

झाडू हाथ में थमा
उसे दश्त के हवाले कर दी

चिराग हांथो से छिनकर
सूरज को
रात के हवाले कर दी

उसकी बस्ती में
कोई आता जाता नहीं
उसकी कश्ती को मौजों के
हवाले कर दी

आसमान
सिकुड़ गया कबका
चाँद को
अंधेरो के हवाले कर दी

मौसमों को
क्या पता था कि
बादल सूख जायेंगें 
जमीन को
बंजर के हवाले कर दी

गुजरते वक्त में
उसने
खूब निभाया साथ अपनो का
लहू के रंग ने उसे
गैरो के हवाले कर दी !