धूप से बनी परछाई वाली छाँव थी अब

अंतहीन इंतजार में
सांस लेता हुआ 
पिंजडे में बंद पंक्षी 
छूट चुके लम्हों का
गिरवी पडा है  अब

अपमानित जिंदगी जीता हुआ
गये पहर के बुझे चिराग सा
पानीहारिन की फुटी मटकी से
जगी प्यास सी
रही जिंदगी उसकी

शब्दों की अन्नत पीडा पर
बरसते रहे बर्फ के गोले 
और तपिश गिरती रही  
कविता की जिस्म पर

उनसे बंधी डोर बडी रेश्मि थी 
जो आंखो को
आठ-आठ आंसू देते खुशी के
अंतस से आती आवाज में
नूर पेशानी की बडी ही रुहानी थी 

शीतल हवा रही एक एक अक्षर
पर 
रिश्तो और जिस्म पर
यकीन न था शब्दों को
इसतरह वह दूर रही दोनों से
और साकार होना था उसे
काठ की मुर्तियों में

धूप से बनी परछाई वाली
छाँव थी अब
जो करीब उतनी ही थी जितनी की दूर
और साथ साथ !!

11 comments:

  1. शब्दो के अन्नत पीडा पर
    बरसते रहे बर्फ के गोले
    पर तपिश गिरती रही
    कविता के जिस्म पर
    वाह ..खूबसूरत बिम्ब से सजी सुन्दर रचना

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  2. बेहद खूबसूरत ख्याल्।

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  3. सुंदर. अतिसुन्दर रचना.

    आभार.

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  4. बहुत ही खुबसूरत ख्यालो से रची रचना......

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  5. सुन्दर एहसास हैं ...

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  6. बहुत बढ़िया और उम्दा प्रस्तुति

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  7. बेहद सुंदर शब्दों से आप ने हर भाव को जिया है .....बहुत सुंदर अभियक्ति

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  8. Bahut achchhi prabhavshali abhivyakti.... Sandhya ji......

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  9. सुन्दर.... सार्थक रचना...
    सादर...

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