कौन कहता है कि
तुझे याद नही
पंक्षियो को उडाना हैं खेतो में
मेढो से लगकर
रोकना है पानी के उन धारो को
जो पिता के खोदी जमीन से बहती थी
प्यास उपजती थी
खेतों में उनदिनों
और अन्न मेहनत जैसा था
पर आज सुखता जाता है
कुँआ भी हर जगह
तुम भागते तांगो के पीछे
छूटते शहर और गाँव के निशानों पर
लिखते रहे चने जैसा कुछ
गरीबी की भूख मिटती रही
अंतरिक्ष में घुमते पिंड खिसकते रहे
और जगह भी बदलते रहे
उनके बदलाव के कारणों को
जानने के वास्ते तू
बैठा कुछ गिनता रहा
वक्त की मार से
पत्तियाँ गिरती रही शाखो से
रुहें उडती रही
और स्याही बन
फैलती रही पन्नों पर
अक्षरें नम मिलती रही
तेरी खिंची चित्रों की जिस्म से
लिपटी रही लरियाँ यादों की
वक्त की बेरुखी से
दफन होती रही गहरे
बांझ पृथ्वी के कोख में
तेरे अश्क
मिठे पानी के झील बनते रहे
शीतल करते रहे पसीजते हथेलियों को
जब भी दोपहर उमस खाती
तब रात डुबती रही
चाँदनी बनती रही
तू बहता रहा हर कही
पर देख तो सही !!
तुझे याद नही
पंक्षियो को उडाना हैं खेतो में
मेढो से लगकर
रोकना है पानी के उन धारो को
जो पिता के खोदी जमीन से बहती थी
प्यास उपजती थी
खेतों में उनदिनों
और अन्न मेहनत जैसा था
पर आज सुखता जाता है
कुँआ भी हर जगह
तुम भागते तांगो के पीछे
छूटते शहर और गाँव के निशानों पर
लिखते रहे चने जैसा कुछ
गरीबी की भूख मिटती रही
अंतरिक्ष में घुमते पिंड खिसकते रहे
और जगह भी बदलते रहे
उनके बदलाव के कारणों को
जानने के वास्ते तू
बैठा कुछ गिनता रहा
वक्त की मार से
पत्तियाँ गिरती रही शाखो से
रुहें उडती रही
और स्याही बन
फैलती रही पन्नों पर
अक्षरें नम मिलती रही
तेरी खिंची चित्रों की जिस्म से
लिपटी रही लरियाँ यादों की
वक्त की बेरुखी से
दफन होती रही गहरे
बांझ पृथ्वी के कोख में
तेरे अश्क
मिठे पानी के झील बनते रहे
शीतल करते रहे पसीजते हथेलियों को
जब भी दोपहर उमस खाती
तब रात डुबती रही
चाँदनी बनती रही
तू बहता रहा हर कही
पर देख तो सही !!